वह पिछले कई दिनों से सरकारी कार्यालय में आ रहे थे। चपरासी से लेकर बड़े बाबू तक से गिड़गिड़ाते हुए वह एक ही बात कह रहे थे, हमसे अच्छे दिनों का वायदा किया गया था, मेरे अच्छे दिन कब आएंगे?
अंततः एक दिन बड़े बाबू को कुछ तरस आया, सो अपने चश्मे से झांकते हुए वह बोले, पहले हमारे अच्छे दिन तो आ जाएं, उसके बाद अपने अच्छे दिन की बात करना। फिर भी ज्यादा जल्दी है, तो फाइल बनवाकर ले आ। साहब से बात करके अच्छे दिन ऑर्डर करवा दूंगा।
अगले दिन फाइल बनवाकर वह फिर सरकारी दफ्तर में थे। लेकिन बाबू जी अपनी कुर्सी से नदारद थे। उन्होंने अधीनस्थ छोटे बाबू से पूछा, बड़े बाबू कब आएंगे?
उसने चश्मे के भीतर से पूछा, बड़े बाबू से क्या काम है?
वह बोले, उन्होंने अच्छे दिनों के लिए फाइल मंगवाई थी, वही जमा करने के लिए आया हूं।
फाइल के साथ कुछ लाए हो या सिर्फ फाइल लाए हो, छोटे बाबू ने अपना परंपरागत प्रश्न दोहराया।
जितना बड़े बाबू ने कहा था, उतना ही तो करता। गांव से शहर आने के लिए बार-बार साहूकार से कर्ज लेना पड़ता है। अब तो मेरे अच्छे दिन आ जाएंगे न?
साहूकार से कर्ज क्यों लिया, बैंक में खाता क्यों नहीं खोला? क्या तुम नहीं जानते कि जन-धन योजना में जीरो बैलेंस पर खाते खोले जा रहे हैं?
खाता खुलवा लिया, फिर भी अच्छे दिन नहीं आए। बैंक वाले कहते हैं, जब खाते में पैसा नहीं है, तो तुम्हें कर्ज कैसे दे दें? तभी तो मैं यहां अच्छे दिनों की उम्मीद के साथ आया हूं।
अच्छे दिनों की यहां भी कोई गारंटी नहीं। पहले हमारे अच्छे दिन तो आएं। उनमें से कुछ बच जाएं, तभी तुम्हारे अच्छे दिनों की उम्मीद की जा सकती है।
गांव से आए उस आदमी को कुछ समझ में नहीं आया। उसने कहा, तो मैं दफ्तर के बाहर बैठकर बड़े बाबू का इंतजार कर लेता हूं। जैसे झाड़ू के अच्छे दिन आएं हैं, वैसे ही मेरे भी अच्छे दिन कभी न कभी तो आएंगे ही।