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भीड़ की हिंसा स्वीकार्य नहीं

अवधेश कुमार Updated Tue, 24 Jul 2018 07:06 PM IST
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अवधेश कुमार
केंद्र सरकार देश भर में भीड़ द्वारा हो रही हिंसा और हत्या से निपटने के लिए अपने स्तर पर जो कदम उठा रही है, उसे स्वाभाविक माना जाना चाहिए। केंद्रीय गृह सचिव के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन हुआ है। समिति को चार हफ्तों में अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी। इसके अलावा गृह मंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रिमंडलीय समूह (जीओएम) भी बनाने का फैसला किया गया है, जो उच्च स्तरीय समिति की अनुशंसाओं पर विचार करेगा। जीओएम अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपेगा। उसके बाद इससे निपटने का समग्र तंत्र तैयार किया जाएगा। केंद्र सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि भीड़ की हिंसा को दंडनीय अपराध के तौर पर परिभाषित करने के लिए कानून में संशोधन किया जाएगा। 


वास्तव में देश का हर विवेकशील व्यक्ति उन्मादित भीड़ के हिंसक आचरण से चिंतित है। उच्चतम न्यायालय द्वारा हिंसा की तीखी आलोचना, केंद्र एवं राज्यों को स्पष्ट निर्देश तथा पुलिस अधिकारियों के दायित्व निर्धारण के बावजूद ऐसी घटनाएं रुक नहीं रहीं। जिस दिन केंद्र सरकार ने ये निर्णय लिए, उसी दिन तीन घटनाएं हमारे सामने आईं। राजस्थान के अलवर से गौ तस्करी के संदेह पर भीड़ द्वारा रकबर नामक एक व्यक्ति की हत्या की खबर आई। इसमें पुलिस की भूमिका की भी जांच हो रही है और राजस्थान सरकार का कहना है कि रिपोर्ट आने पर दोषी पुलिसवालों पर कार्रवाई होगी। इस मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है और एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर को निलंबित करने तथा तीन कॉन्स्टेबलों को लाइन हाजिर करने की सूचना दी गई है। 


दूसरी घटना भी राजस्थान के बाड़मेर की है, जहां एक दलित युवक की गांव वालों ने इसलिए पीट-पीटकर हत्या कर दी, क्योंकि वह दूसरे समुदाय की लड़की से प्यार करता था। तीसरी घटना मध्य प्रदेश की है, जहां सिंगरौली जिले के एक गांव में एक 30 वर्षीय विक्षिप्त महिला को बच्चा चोर बताकर लोगों ने मार डाला। ये तीन घटनाएं भीड़ की हिंसा की तस्दीक करती हैं, लेकिन सबके कारण एक नहीं हैं। यानी राजनीतिक रंग देने के लिए भीड़ की हिंसा का जिस तरह से चित्रण किया जा रहा है, वह एकपक्षीय सच है। इसे उजागर करना आवश्यक है, क्योंकि हिंसा को रोकने के लिए उनके कारणों का अलग-अलग विश्लेषण करके निष्कर्ष तक पहुंचना होगा। 


हमारा उद्देश्य भीड़ के हिंसक चरित्र को खत्म करना होना चाहिए। दुर्भाग्य से इस पर हो रही राजनीति से मामला और बिगड़ रहा है। अब तक एक भी ऐसी घटना नहीं, जिनमें आरोपी नहीं पकड़े गए, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। पिछले दिनों ही झारखंड में बीते साल हुई भीड़ की हिंसा के एक मामले में 12 लोगों को सजा हुई है। राज्यों ने भी इसे रोकने के लिए अपनी ओर से कई कदम उठाए हैं। अफवाह से दूर रहने और कानून हाथ में न लेने की अपील हो रही है। केंद्र सरकार ने राज्यों को दो एडवायजरी जारी किया है। 


इसके बावजूद यदि भीड़ द्वारा हिंसा हो रही है, तो मामला उससे ज्यादा गंभीर है, जितना समझा जा रहा है। इसके लिए सबसे जरूरी है, सामाजिक जागरूकता। भीड़ को नियंत्रित करना आसान नहीं होता, किंतु भीड़ बनने के पहले किसी अफवाह की अवस्था में कैसा व्यवहार करें, उन्हें यह समझा पाना संभव है। देश के अनेक क्षेत्रों से गौ-तस्करी और गौ-चोरी की वारदातों की पुष्ट खबरें भी आ रही है। जगह-जगह गौरक्षकों के ऐसे समूह खड़े हो गए हैं, जो स्वयं ही फैसला करने पर उतारू हैं। कानून के राज में यह बिल्कुल अस्वीकार्य है। 

 
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