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मुद्दा: अब गांव भी बन रहे सहारा...अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है, पर अब भी कई चुनौतियों का निराकरण बाकी

जयंतीलाल भंडारी
Updated Mon, 03 Nov 2025 08:16 AM IST

सार

ग्रामीण भारत से अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है, पर अब भी कई चुनौतियों का निराकरण किया जाना शेष है।
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ग्रामीण भारत से अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : ANI


हाल ही में जारी विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की विकास दर चालू वित्त वर्ष 2025-26 में 6.5 फीसदी रहेगी और भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना रहेगा। इसी तरह एस एंड पी ग्लोबल रेटिंग्स द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, महंगाई घटने और करों में कटौती से भारत की ग्रामीण खपत में सुधार हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रकाशित ग्रामीण उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीणों में गांवों के मौजूदा आर्थिक स्थिति को लेकर विश्वास बढ़ा है। पिछले एक साल में 76.7 फीसदी ग्रामीण परिवारों में उपभोग वृद्धि और 39.6 फीसदी परिवारों में आय में वृद्धि सामने आई है। इसी तरह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि गरीबी में कमी शहरी इलाकों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में अधिक तेजी से हुई है। वर्ष 2011-12 में ग्रामीण गरीबी 25.7 प्रतिशत और शहरी गरीबी 13.7 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2023-24 में ग्रामीण गरीबी घटकर 4.86 प्रतिशत और शहरी गरीबी घटकर 4.09 प्रतिशत पर आ गई है। राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में अब 54.5 फीसदी परिवार केवल औपचारिक स्रोतों से ऋण लेते हंै, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।


वर्ष 2019 से शुरू की गई प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना देश के करोड़ों छोटे और सीमांत किसानों को वित्तीय मजबूती देती दिख रही है। गांवों में अप्रैल 2020 से शुरू की गई पीएम स्वामित्व योजना के तहत ग्रामीणों को उनकी जमीन का कानूनी हक देकर उनके आर्थिक सशक्तीकरण का नया अध्याय लिखा जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में औपचारिक ऋण व्यवस्था ने अच्छी प्रगति की है। साथ ही किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड, सहकारी समितियों और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूह, ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था आदि प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।


सरकार ने बीते 11 वर्षों में सब्सिडी और फसल बीमा की राशि को तेजी से बढ़ाया है। भारतीय किसान तेजी से डिजिटल पेमेंट को अपना रहे हैं। वर्ष 2024-25 में भारत में रिकॉर्ड 35.39 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन हुआ है तथा देश का कुल कृषि निर्यात 50 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है। लेकिन देश के छोटे और सीमांत किसान अब भी आधुनिक खेती की तकनीक अपनाने में असमर्थता अनुभव कर रहे हैं। अब भी करीब 22 फीसदी ग्रामीण कर्ज के लिए साहूकारों और अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर हैं। जब छोटे किसानों को आय अस्थिरता, मौसमी जोखिमों और सरकार से पर्याप्त धन हस्तांतरण की कमी का सामना करना पड़ता है, तब ये किसान उच्च ब्याज के बावजूद साहूकारों से कर्ज लेते हैं। कई बार छोटे किसान औपचारिक स्रोतों से ऋण लेना तो चाहते हैं, मगर दस्तावेज की कमी, गारंटी दाता की कमी एवं अन्य शर्तें बाधक बन जाती हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा प्रकाशित ऋण और निवेश सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग पचास प्रतिशत कृषि परिवार अब भी कर्ज में डूबे हुए हैं।


ऐसे में गांवों में साहूकारों और अनौपचारिक ऋणों पर निर्भरता घटाने के लिए बैंक शाखा विस्तार के अलावा नई रणनीति के तहत दूसरे कदम उठाने की जरूरत है। ग्रामीण ऋण लागत कम करने और विश्वास बढ़ाने के लिए तकनीक का लाभ उठाना होगा। औपचारिक ऋणों के लिए बेहतर प्रोत्साहन और डिजिटल उपकरणों से लैस बैंक प्रतिनिधियों को ग्रामीण परिवारों और संस्थानों के बीच समन्वय का माध्यम बनाना होगा। खासतौर से ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अंतिम छोर तक मजबूत गैर-बैंकिग वित्तीय कंपनी की भूमिका को प्रभावी बनाना होगा। अभी गांवों में गरीबी नियंत्रण, कृषि क्षेत्र में आधुनिकीकरण और उत्पादकता बढ़ाने, ग्रामीण बुनियादी ढांचोंं के विकास, ग्रामीण स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और कौशल युक्त शिक्षा तथा ग्रामीण बेरोजगारी जैसी चुनौतियों के निराकरण के लिए अधिक रणनीतिक प्रयास करने होंगे।


उम्मीद करें कि सरकार खासतौर से ग्रामीण गरीबी का सामना कर रहे परिवारों के युवाओं को कौशल प्रशिक्षण और डिजिटल कौशल से सुसज्जित करके रोजगार से सशक्तीकरण का अभियान आगे बढ़ाएगी। उम्मीद करें कि सरकार विकसित भारत के लिए आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत के परिप्रेक्ष्य में स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहन देते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और सशक्त बनाएगी।

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