कानपुर के छंटे हुए बदमाश, गुंडे और आठ पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी विकास दुबे के एनकाउंटर को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। कुछ जातिवादी लोगों ने इस एनकाउंटर को जाति के चश्मे से देखना शुरू कर दिया है। वे कह रहे हैं, कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों को निशाना बनाया जा रहा है। जाहिर है, यह एक राजनीतिक साजिश है, ताकि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को एक जाति-विशेष का शत्रु बताया जा सके।
इस खेल को समझने के लिए पहले तो विकास दुबे के क्राइम ग्राफ को समझना ज़रूरी है। और यह भी, कि जो लोग उसे ब्राह्मणों का नायक समझ रहे हैं, वे जान लें कि विकास दुबे के निशाने पर ज्यादातर ब्राह्मण ही थे। विकास दुबे पर 1990 के दशक में पहली बार हत्या का आरोप तब लगा, जब कन्नौज के समीप गलवां गांव में एक व्यक्ति की हत्या हुई। जिसकी हत्या हुई, वह ब्राह्मण जाति था। उसके बाद कानपुर के बिकरू गांव में सोनेलाल चतुर्वेदी और उनकी विधवा बहन फूलकुंवर दुबे की हत्या हुई।
फूलकुंवर के पास बिकरू में बहुत जमीन थी, और उन्होंने काफी जमीन शिवली के ताराचंद ट्रस्ट को दे रखी थी। यह ट्रस्ट कई स्कूल/कॉलेज चलाता है। फूलकुंवर विधवा थीं, उन्होंने अपनी जमीन की देखरेख के लिए अपने भाई सोनेलाल चतुर्वेदी को बुला लिया था। 1997 में सोनेलाल चतुर्वेदी की हत्या हुई और हत्यारे के तौर पर विकास दुबे का नाम आया। इसके बाद फूलकुंवर भी मार दी गईं।
इसी दौरान एक कोल्ड स्टोरेज में लूट हुई और वहां से लूटी गई रकम लेकर यह कानपुर शहर स्थित शास्त्री नगर मोहल्ले के बदमाश राजू खुल्लर के घर आ गया, जहां से काकादेव थाने के प्रभारी बीके तिवारी इसे पकड़ लाए। लेकिन कांग्रेस नेता और चौबेपुर के विधायक हरिकृष्ण श्रीवास्तव ने वहां पहुंच कर इसे मुक्त करा लिया था। इस राजू खुल्लर की बहन ऋचा निगम से विकास दुबे ने शादी की।
शिवली में ताराचंद ट्रस्ट के तहत चल रहे इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल सिद्धेश्वर पांडेय की हत्या 14 नवंबर, 2000 को हुई और उसमें विकास को आजीवन सजा भी हुई। इस इंटर कॉलेज के सामने कुछ जमीन थी, जिस पर पांडेय जी एक डिग्री कॉलेज बनाना चाहते थे। विकास दुबे यह जमीन हड़पना चाहता था।
उसने इस बारे में कहा भी, जब पांडेय जी नहीं माने तो विकास ने दिन-दहाड़े अपने उन गुरु जी की हत्या कर दी, जिन्होंने उसे पढ़ाया था। इस हत्याकांड में इसे बचाने के लिए जिन लोगों का नाम आया, उसमें एक भाजपा नेत्री भी थीं। उसके बाद विकास दुबे का नाम चढ़ता गया। शिवली टाउन एरिया के चेयरमैन थे लल्लन वाजपेयी, जमीन को लेकर विकास की उनसे अदावत थी।
एक बार यह शिवली थाने में वाजपेयी को घेरने के लिए पहुंचा। तब उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह की सरकार थी। वाजपेयी ने राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त भाजपा नेता संतोष शुक्ल को फोन किया, वे सदल-बल पहुंचे। शिवली थाने के भीतर ही विकास दुबे ने संतोष शुक्ल को मार दिया। इस एक घटना से विकास का इतना आतंक हो गया कि किसी की भी इसके विरुद्ध गवाही देने की हिम्मत नहीं पड़ी।
खुद संतोष शुक्ल के गनर और गार्ड भी कोर्ट में मुकर गए। जब विकास जमानत पर था, तब दो लड़कों-मिश्रा और त्रिपाठी की हत्या में इसका नाम आया। किंतु तब तक इसने विधिवत बसपा जॉयन कर ली थी। तब सूबे में मायावती की सरकार थी। कहा जाता है, तब बसपा के तीन विधायक उसका समर्थन करते थे।
मुलायम सरकार के समय कल्याणपुर थाने के प्रभारी हरचरण सिंह यादव पर इसने रिवाल्वर तान दी थी। किंतु तब बसपा नेताओं के दबाव में यह छूट गया। कांग्रेस के पूर्व विधायक भूधर नारायण मिश्र का कहना है कि पिछले बीस वर्षों में योगी सरकार ही इसे नेस्तनाबूद करने का साहस दिखा पाई। सच तो यह है कि शिवली के आसपास के समस्त इलाके को इसके जुल्मों से राहत मिली है।
जब सिद्धेश्वर पांडेय की हत्या के बाद यह जमानत पा गया, थाने के भीतर एक मंत्री की हत्या करने के बावजूद गवाहों के मुकरने के चलते इसे तब के जज एमएच अंसारी ने दोषमुक्त कर दिया, ऐसे कुख्यात गुंडे को बचाने के लिए उसके ब्राह्मण होने की दलील देना बौद्धिक दिवालियेपन का दर्शाता है।
जो लोग विकास के एनकाउंटर को हैदराबाद बलात्कार कांड के अभियुक्तों के एनकाउंटर से जोड़कर देख रहे हैं, उनको पता होना चाहिए कि हैदराबाद के अभियुक्तों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था। जबकि विकास दुबे इतना खूंखार अपराधी था कि पूरा कानपुर शहर और देहात इसके नाम से थर्राता था।
कोई इसके विरुद्ध गवाही देने की हिम्मत करना तो दूर, पुलिस में रिपोर्ट लिखाने तक की हिम्मत नहीं करता था। इसलिए पूरे क्षेत्र के लोग इसके एनकाउंटर से राहत महसूस कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश शासन ने इस एनकाउंटर की जांच के लिए एक ईमानदार छवि वाले अतिरिक्त मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एसआईटी का गठन किया, जिसमें अपर पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक सदस्य के रूप में हैं।
इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग भी बनाया है। इस तरह नागरिक अधिकार मोर्चा (पीयूसीएल) तथा अन्य बनाम भारत संघ (2014) के एक मुकदमे पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का उत्तर प्रदेश ने अक्षरशः पालन किया है। इसलिए हमें दुर्दांत विकास दुबे को सिर्फ एक अपराधी की तरह देखना चाहिए, राजनीतिक लाभ के लिए उसे हीरो बनाना घातक होगा।