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लोगों ने अपना मन बना लिया है

Sun, 15 Sep 2013 07:20 PM IST
तवलीन सिंह
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नई दिल्ली से जयपुर का फासला है तो सिर्फ दो सौ किलोमीटर, लेकिन दूरियां इससे कितनी ज्यादा हैं, मैंने पिछले हफ्ते अपनी आंखों से देखा। नरेंद्र मोदी की उत्तर भारत में पहली आम सभा देखने गई थी, क्योंकि यह राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहली महत्वपूर्ण परीक्षा थी।
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सोचा था, मेरे जैसे कई वरिष्ठ पत्रकार इसी ख्याल से पहुंचेंगे जयपुर के अमरूदों के बाग, जहां जलसा होना था। वरिष्ठ पत्रकार होने का सबसे बड़ा लाभ यही होता है कि हम जैसे लोगों ने कई बार इतिहास को आंखों के सामने बनते देखा है। इसलिए हम हर नई सियासी घटना को, हर नए राजनीतिक मोड़ को अपने अनुभव के समक्ष रखकर तौल सकते हैं।

ऐसा करने के बाद कह सकती हूं मैं कि मोदी का यह जलसा विशाल था इतना कि अगर आंखों से न देखा होता, तो यकीन करना मुश्किल होता। मुझे याद आया 1977 की वे आम सभाएं, जो जनता पार्टी की तरफ से उस वक्त हुई, जब चुनाव का एक ही मुद्दा बन गया था-इंदिरा गांधी हटाओ।
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उन सभाओं को देखकर इंदिरा जी इतनी डर गई थीं कि रामलीला मैदान में जिस दिन एक सभा होनी थी, उस दिन दूरदर्शन पर बॉबी फिल्म लगवा दी। जब वोट क्लब में हुआ जलसा जगजीवन राम के कांग्रेस से इस्तीफे के बाद, तो दिल्ली सरकार को आदेश देकर मंच गिरवा दिया। राजनेता उस टूटे मंच के सामने खड़े होकर बोले, और अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना भाषण टूटे मंच की तरफ इशारा करके इस शेर से शुरू किया, खंडहर बता रहे हैं इमारत बुलंद थी।

उस साल भी दफ्तरों में बैठे राजनीतिक पंडितों ने इन आम शब्दों को अनदेखा करके, तय कर लिया था कि इंदिरा जी को हटाना संभव ही नहीं है। आज वैसे ही लोग दिल्ली में बैठकर तय कर चुके हैं कि मोदी का प्रधानमंत्री बनना असंभव है।

पूछो, तो कहते हैं कि हिसाब किया है उन्होंने, जिससे दिखता है कि भाजपा को उतनी सीटें नहीं मिल सकेंगी कि वह अगला प्रधानमंत्री बना सके। यह भी कहते हैं मेरे राजनीतिक पंडित बंधु कि कई चुनाव हो चुके हैं, जो साबित करते हैं कि मोदी की लोकप्रियता बेशक जितनी हो, वह सीटें नहीं दिलवा सकते।

जयपुर के अमरूदों के बाग पहुंचकर आश्चर्य हुआ मुझे कि दिल्ली से इन राजनीतिक पंडितों ने वहां पहुंचने की तकलीफ भी नहीं की। आते, तो शायद उनको जनता की निराशा का एहसास होता, जनता के गुस्से की आवाज सुनाई देती। जलसा शुरू होना था ग्यारह बजे, और मैं देर से पहुंची, क्योंकि दिल्ली-जयपुर हाई-वे इतना टूट चुका है कि चार घंटों के बदले छह घंटे लगे। जब तक मैं पहुंची, राजस्थान के देहातों से इतने लोग पहुंच चुके थे कि उस बड़े-से शामियाने के बाहर भी पांव रखने की जगह नहीं थी।

गर्मी तेज थी इतनी कि कई लोग बेहोश हो गए, लेकिन जाने का नाम नहीं लिया। कई लोग तो सुबह ही आ गए थे और अपनी जगह से घंटों हिले नहीं। जब मंच से ऐलान हुआ कोई साढ़े बारह बजे कि नरेंद्र मोदी जयपुर में लैंड हो चुके हैं, तो मो-दी, मो-दी, मो-दी की आवाज उठी जनसैलाब से। और जब मोदी स्वयं पहुंचे, तो ऐसा हल्ला मचा कि खुद उनको वंदे मातरम का नारा लगाना पड़ा भीड़ को नियंत्रण में लाने के लिए।

वसुंधरा राजे को तो फिर भी मौका दिया अपनी बात रखने का, पर जब उनके बाद राजनाथ सिंह ने बोलना शुरू किया, तो लोगों ने अपनी बेसब्री साफ जाहिर की। ऐसा लगा कि वे आए थे सिर्फ मोदी को देखने-सुनने, और किसी को नहीं। इतना समर्थन किसी राजनेता के लिए मैंने बहुत वर्षों से नहीं देखा है।

काश कि दिल्ली में बैठे उन राजनीतिक पंडितों ने देखा होता, जो इस जलसे के बारे में सिर्फ यह लिखते फिरते हैं कि मुसलमानों को जबर्दस्ती मुस्लिम लिबास में आना पड़ा। काश कि लालकृष्ण आडवाणी ने आकर देखा होता कि समर्थन जनता का भाजपा के लिए कम है और मोदी के लिए ज्यादा। आम लोगों से जब मैंने पूछा कि वे क्यों पसंद करते हैं मोदी को, तो तकरीबन एक ही जवाब मिला, देश को ऐसे नेता की जरूरत है। इसीलिए भाजपा ने उनका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित किया है।

भविष्यवाणी पत्रकारों को नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हम ज्योतिषी नहीं हैं। लेकिन विनम्रता से कहना ही पड़ेगा मुझे कि उत्तर भारत में नरेंद्र मोदी की पहली आम सभा को देखकर मुझे यकीन हो गया कि लोगों ने अपना मन बना लिया है।
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