दिल्ली के चुनावों पर लिखने का इरादा बना ही रही थी कि मुझे इस शहर के प्रसिद्ध ब्रिटिश स्कूल में जाना पड़ा। न्योता मिला था 12वीं कक्षा के बच्चों को भारतीय राजनीति का थोड़ा ज्ञान देने के लिए। चूंकि मेरी भतीजी इस स्कूल में इसी कक्षा में पढ़ती है, इसलिए मुझे वहां जाना ही पड़ा।
ब्रिटिश स्कूल की शानदार इमारत उस इलाके में है, जहां निर्मित हैं कई देशों के विशाल दूतावास। स्कूल में दाखिल होने से पहले मेरी नजर एक झुग्गी बस्ती पर पड़ी, जो स्कूल गेट के सामने है सड़क के उस पार। सोचा, पहले जरा बस्ती वालों से चुनाव के बारे में पूछ आऊं। सो पहले उस कच्ची बस्ती में गई। अंदर जाते ही यह दृश्य पेश आया-गंदी नालियां, कूड़े के ढेर, छोटी-छोटी एक दूसरे से जुड़ी हुई झुग्गियां, गंदी गलियों में खेलते हुए छोटे बच्चे। ठंडे मौसम में भी बच्चों के पास न जूते थे, न गर्म कपड़े। साफ दिखा कि धनवानों के इस इलाके में रहते हैं इस शहर के सबसे गरीब लोग। बुनियादी सुविधाएं भी नहीं उपलब्ध हैं जिन्हें। पूछने पर पता लगा कि पिछली बार इस बस्ती का वोट भाजपा को गया था, पर इस बार लोगों का रुख आम आदमी पार्टी की तरफ है। जब मैंने पूछा कि ऐसा क्यों, तो लंबी सांसें लेकर लोगों ने कहा कि उनके लिए किसी ने कुछ किया नहीं अभी तक, सो किसी नए दल को वे अवसर देना चाहते हैं। आवास के वायदे कांग्रेस और भाजपा ने खूब किए हैं इस चुनाव में, लेकिन इन वायदों पर, लगता है, गरीबों का भरोसा नहीं रहा है।
द्वारका के पास के एक गांव में भी लोगों से बातचीत से पता लगा कि वहां भी आप की हवा चल रही है। मैंने जब याद दिलाया कि अरविंद केजरीवाल की पिछली सरकार में उन्होंने ज्यादा समय धरना करने पर दिया, तो जवाब मिला कि फिर भी उन्हें मौका मिलना चाहिए, क्योंकि राजनीति में वह अब भी नए खिलाड़ी हैं, सो संभव है कि इस बार कुछ करके दिखाएं। ऐसी बातें दिल्ली के शिक्षित, मध्यवर्गीय लोग नहीं करते हैं। उनके लिए केजरीवाल मजाक बन गए हैं। कहने का मतलब यह कि दिल्ली वालों का वोट बंटा हुआ है इस बार, सो परिणाम कुछ भी हो सकते हैं।
दिल्ली का दिल जीतना नरेंद्र मोदी के लिए इज्जत का सवाल बन गया है। अगर भाजपा सरकार नहीं बना पाती है इस बार भी, तो शायद इस दल के आला नेता समझ जाएंगे कि संगठन में कितनी कमजोरियां आ चुकी हैं। न आई होतीं, तो आखिरी समय में किरण बेदी को लाने की जरूरत न महसूस होती। किरण बेदी की छवि है तो बड़ी अच्छी, पर वह राजनीति में नई हैं, इसलिए उनके कई भाषण, बयान ऊटपटांग-से लगे हैं।
बेहतर होता, यदि शुरू से इस चुनाव में मुकाबला मुद्दों का होता, क्योंकि दिल्ली में मुद्दे वही बिजली, पानी, सड़क, स्कूल, आवास, रोजगार के हैं, जो बाकी देश में हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि ये गंभीर मुद्दे छिप जाते हैं चमकती इमारतों के सायों में। यहां चौड़ी-चौड़ी सड़कें हैं, शीशे के मॉल हैं और शानदार मेट्रो भी है, लेकिन थोड़ा-सा कुरेदने पर मालूम होता है कि इन अति-आधुनिक चीजों के पीछे हैं सैकड़ों गरीब, बेहाल बस्तियां। इसका फायदा मिल सकता है अरविंद केजरीवाल को।