चुनाव परिणाम आने के बाद देश की राजनीति में बड़े परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व बना सपा-बसपा का महागठबंधन टूट गया। हालांकि यह गठबंधन टिकने वाला नहीं है, इसको लेकर चुनाव से पहले ही सभी को अंदाजा था। हालांकि हार का ठीकरा सपा के माथे फोड़ते हुए गठबंधन से अलग होने का निर्णय बसपा ने एकतरफा लिया है। बसपा सुप्रीमो का यह निर्णय दर्शाता है कि विपक्ष की राजनीति समाज में होने वाले परिवर्तन के मूल मुद्दों एवं विचारों से भटक गई है। विचारधारा की अस्पष्टता और दृष्टिकोण में असमानता के साथ जब राजनीतिक गठबंधन सिर्फ सत्ता के अवसरवाद में बनते हैं, तो उनका स्वाभाविक हश्र कुछ इसी तरह का होता है।
भारत की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित करने वाले नेताओं में बाबा साहेब आंबेडकर, डॉ राममनोहर लोहिया और पंडित दीन दयाल उपाध्याय प्रमुख हैं। लोहिया ने राजनीति में सप्तक्रांति का विचार दिया। यह सामाजिक परिवर्तन एवं सुधारों के बुनियादी आवश्यकताओं को परिभाषित करने वाले बिंदु की तरह है। सप्तक्रांति की बात करते हुए डॉ. लोहिया ने लैंगिक भेदभाव से मुक्ति तथा स्त्री-पुरुष समानता की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने राजकीय, आर्थिक और मानसिक स्तर पर भेदभाव से मुक्त होने की जरूरत का विचार दिया है। सप्तक्रांति के विचारों में जन्मजात रूप से जातिगत पिछड़ापन को सामाजिक समस्या के रूप में चिह्नित करते हुए, इसके निराकरण की बात की गई है। पैदावार बढ़ाने, पूंजीगत विषमता, आर्थिक असमानता आदि विषयों को डॉ. लोहिया ने अपने विचारों में सही ढंग से रेखांकित किया है।