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कीमती हार का सदुपयोग

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धर्मग्रंथों में कहा गया है कि भौतिक सुख-सुविधाओं का उपयोग जरूरत के अनुसार ही करना चाहिए। जो व्यक्ति संयमित जीवन जीता है, वह मोक्ष का हकदार होता है। एक बार राजपरिवार की विशाखा सेविका सुप्रिया के साथ श्रावस्ती के विहार में भगवान बुद्ध के दर्शन के लिए पहुंची। वह अत्यंत मूल्यवान हीरे-जवाहरात जड़ा स्वर्णाभूषण गले में धारण किए हुई थी। बुद्ध के समक्ष पहुंचने से पूर्व उसने गले से आभूषण निकाला और सेविका को देते हुए कहा, इसे कहीं रख दो। दर्शन के बाद पुनः धारण कर लूंगी। भगवान के समक्ष वैभव का प्रदर्शन अनुचित होगा। सुप्रिया ने आभूषण एक झाड़ी में रख दिया।
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उपदेश सुनते-सुनते विशाखा तन्मय हो उठी। लौटते समय उसे ध्यान नहीं रहा कि आभूषण झाड़ी से उठाना है। बुद्ध के शिष्य आनंद भ्रमण के लिए निकले, तो उन्होंने झाड़ी में हार पड़ा देखा। वह समझ गए कि यह विशाखा का ही है। उन्होंने उसे बुद्ध के सामने रख दिया। बुद्ध ने आदेश दिया, इसे वापस कर दो।

आनंद ने एक भिक्षु को महल में भेजा। उसने विशाखा से कहा, अपना हार विहार से मंगवा लें। यह सुनकर विशाखा ने कहा, यह हार भगवान बुद्ध की पावन दृष्टि से पवित्र हो चुका है। अब इसका उपयोग मेरे शरीर के लिए नहीं होगा। इसे बेचकर मिलने वाले धन का सदुपयोग जनहित के कार्यों पर किया जाए। भगवान बुद्ध एक महिला की दानवृत्ति देखकर गद्गद हो उठे।
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