अक्तूबर 1947 में, उसने कहा कि ‘कबाइलियों’ ने कश्मीर पर आक्रमण किया, लेकिन शेख अब्दुल्ला ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इसका पर्दाफाश किया। 1999 में, कारगिल में उसने कहा कि घुसपैठिये ‘विद्रोही’ थे, लेकिन यह दावा बाद में झूठा साबित हुआ। पाकिस्तानी सेना प्रमुख के कबूलनामे उसकी भूमिका को पुष्ट करते हैं। अजमल कसाब के पकड़े जाने तक उसने 26/11 मुंबई हमलों में अपनी भूमिका से इन्कार किया। हैरानी नहीं कि पाकिस्तान ने पहलगाम में 25 पर्यटकों और एक कश्मीरी टट्टू संचालक पर हुए कायरतापूर्ण हमले में अपनी भूमिका से इन्कार किया है। सवाल यह है कि पाकिस्तान ने जो किया, वह क्यों किया और अभी ही क्यों किया? इसका जवाब डोनाल्ड ट्रंप के भू-राजनीति को फिर से स्थापित करने के तीन-आयामी दृष्टिकोण द्वारा तैयार किए जा रहे उभरते वैश्विक गठबंधन में भारत की पुनः स्थिति में निहित है।
भारत की ओर अमेरिका के झुकाव ने चीन में चिंता पैदा कर दी है। ट्रंप के साथ बैठक के दौरान प्रस्तावित मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (मागा) के वादे के प्रति नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया स्पष्ट है-मसलन, एपल द्वारा उत्पादन में तेजी लाना और अमेरिकी बाजारों के लिए उत्पादन को चीन से भारत में स्थानांतरित करना। चीन के लिए ट्रंप का टैरिफ एजेंडा वैश्विक व्यापार में उसके वर्चस्व को खतरे में डालता है। बृहस्पतिवार को ट्रंप ने कहा कि वह चीन पर 80 प्रतिशत टैरिफ को उचित मानते हैं। अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक से आर्थिक मोर्चे पर खुद को दूर कर रहा है। चीन का उद्देश्य भारत की वृद्धि और इसमें बढ़ रही वैश्विक दिलचस्पी को रोकना है। पहलगाम में हुए हमले में चीन की छाप और डिजिटल पदचिह्न भरे पड़े हैं। आतंकवादियों ने चीनी हुआवेई सैटेलाइट फोन, बेईदोऊ पर आधारित नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया, जो सीएनएसए के स्वामित्व वाली चीनी सैटेलाइट प्रणाली है। वे एन्क्रिप्टेड चीनी एप का उपयोग करके अपने आकाओं से संवाद करते थे।
यह पहली बार नहीं है-पहले की मुठभेड़ों की जांच से पता चलता है कि विदेशी आतंकवादी ‘अल्ट्रा सेट’ जैसे चीनी उपकरणों का उपयोग कर रहे थे। सवाल यह है कि पाकिस्तान चीन के इशारे पर क्यों चल रहा है। इसका उत्तर इतिहास से मिलता है। पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र रहा है और इसलिए दशकों से बड़े देशों पर निर्भर रहा है। 1970 के दशक में इसने समर्थन के लिए अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम करने की व्यवस्था की। अप्रैल 1971 में, जब पूर्वी पाकिस्तान में कत्लेआम हो रहा था, रिचर्ड निक्सन ने हेनरी किसिंजर को कहा था, ‘याह्या को मत दबाओ।’ यह तब अमेरिका पर निर्भर था, और अब चीन पर निर्भर है।
पिछले 35 वर्षों में पाकिस्तान 25 से अधिक बार बेलआउट पैकेज के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) गया, जो उसकी निर्भरता को ही दर्शाता है। इसकी क्रेडिट रेटिंग सीएए2 है, जो ऋणदाताओं के बीच खराब स्थिति को दर्शाती है। जीडीपी वृद्धि 2.6 प्रतिशत है; मुद्रास्फीति 23 प्रतिशत पर है। 130 अरब डॉलर का ऋण इसके निर्यात का 352 प्रतिशत है। चीन वर्तमान में 29 अरब डॉलर के साथ सबसे बड़ा ऋणदाता है, उसके बाद विश्व बैंक, एडीबी और सऊदी अरब हैं। पाकिस्तान की गरीबी के पीछे वहां की राजनीतिक स्थिति है। पाकिस्तान की फौज ने वहां 31 से ज्यादा वर्षों से प्रत्यक्ष और 70 वर्षों से ज्यादा समय से परोक्ष रूप से शासन किया है, जो आतंकी संगठनों को सलाह देने और उन पर नियंत्रण रखने का काम करती है। लेकिन पाकिस्तानी फौज काफी अलोकप्रिय है। वहां चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी के नेता जेल में हैं, और शहबाज शरीफ के नेतृत्व में छह दलों का जनादेश चुराने वाला गठबंधन लड़खड़ाते हुए सत्ता में है। इसलिए इस आतंकवादी हमले को ध्यान भटकाने तथा तेजी से खत्म हो रहे राष्ट्रीय गौरव को पुनः जगाने के साधन के रूप में देखा जा रहा है।
पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को राजकीय नीति के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की बात आतंकवादियों के राजकीय अंतिम संस्कार की तस्वीरों से स्पष्ट है। इसकी बदनामी यूएनएससी की 1,267 आतंकवादियों और आतंकी संगठनों की सूची में दर्ज है। पिछले दो दशकों में यह नौ वर्षों तक वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीएफ) की ‘ग्रे सूची’ में रहा है। पाकिस्तान चीन के वैश्विक वर्चस्व के लक्ष्य में एक साधन है-छद्म युद्धों के लिए उपयोगी और इसके विस्तारवाद के लिए महत्वपूर्ण, चाहे वह बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव हो या पाकिस्तान के माध्यम से आर्थिक गलियारा। चीन ने लगातार यूएनएससी प्रतिबंधों के तहत पाकिस्तानी आतंकवादियों को नामित करने के भारत के प्रयासों को रोका है। हाल ही में, चीन ने पहलगाम की जिम्मेदारी लेने वाले लश्कर से जुड़े टीआरएफ को नामित करने के भारत के कदम को रोक दिया और बलूच समूहों को प्रतिबंधित करने में पाकिस्तान का समर्थन किया।
शनिवार को अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद पाकिस्तान और भारत ने युद्ध विराम पर सहमति जताई। यह चीन-पाकिस्तान की कपटपूर्ण रणनीति का एक और उदाहरण हो सकता है। पाकिस्तान अब भी दो राष्ट्र सिद्धांत पर जोर दे रहा है, जबकि वह अस्तित्व के लिए जूझ रहा है, जबकि भारत एक बहु-धार्मिक जीवंत लोकतंत्र है। दुनिया को इन तथ्यों को पहचानना चाहिए। पिछले हफ्ते, आईएमएफ ने पाकिस्तान को और ज्यादा पैसे दिए, जबकि इस बात के स्पष्ट सुबूत हैं कि उसने आतंकवाद की फंडिंग में इसका दुरुपयोग किया है। पाकिस्तान के पक्ष में मतदान करने वाले देशों को इस पर विचार करना चाहिए। वे कब तक पाकिस्तान के बेशर्मी भरे आचरण को स्वीकार करेंगे? यह मौन स्वीकृति आतंकवाद से निपटने में उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाती है। जहां तक भारत का सवाल है, उसे चीन के सवाल का जवाब तलाशना होगा।