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अंतरराष्ट्रीय: भू-राजनीतिक जादुई यथार्थवाद और मादुरो के हश्र से उपजी व्याख्याएं

एस प्रसन्नराजन
Updated Sat, 17 Jan 2026 07:14 AM IST

सार

दक्षिण अमेरिका के क्रूर इतिहास की हवाओं में जादुई यथार्थवादी कहानियां तैरती हैं और कल्पना अब भी उसके कथित मुक्तिदाता तानाशाहों का घर है, मगर असलियत उतनी शानदार नहीं है। मादुरो के बिना दुनिया (ठीक वैसे ही जैसे सद्दाम के बिना) एक बेहतर जगह है।
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निकोलस मादुरो, वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति - फोटो : ANI


यूक्रेन खुशकिस्मत है कि उसके पास सर कीर जैसा कोई रक्षक है, साथ ही उतने ही परेशान और साथी अंतरराष्ट्रवादी इमैनुएल मैक्रों भी हैं। वामपंथी विचारधारा के धुरंधरों के विपरीत, सर कीर ने मादुरो के प्रति अपनी प्रतिक्रिया में बहुत सावधानी बरती, जिन्हें, सभी के अनुसार, सद्दाम हुसैन जैसा बर्ताव नहीं मिला : पायजामे में उठाकर ले जाना और हथकड़ी लगाना, मकड़ी के बिल से बाहर निकाले जाने से कम अपमानजनक है, जहां उसके अपहरणकर्ता दाढ़ी वाले, बिखरे बालों वाले आदमी के खुले मुंह में झांक रहे थे, जिसने सत्ता में रहते हुए खुद को बाथवाद का नेबुचादनेजर (सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला) बताया था।


स्टार्मर ने मादुरो के लिए सार्वजनिक रूप से आंसू नहीं बहाए, जैसा कि उन्होंने अला अब्देल-फतह के लिए किया था, जिसने कुछ समय पहले यहूदियों को मारने और डाउनिंग स्ट्रीट को जलाने की बात कही थी। पछतावा करने वाले, नफरत फैलाने वाले और हाल ही में ब्रिटिश नागरिक बने इस व्यक्ति को अब्देल फतह अल-सिसी (मिस्र के राष्ट्रपति) के मिस्र से बहुत धूमधाम से घर लाया गया। मादुरो के मामले में, स्टार्मर बस अमेरिका के साथ खड़े रहे, और गिरफ्तारी के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा। पर ब्रिटेन की विपक्षी कंजर्वेटिव नेता केमी बेडेनोच ने ट्रंप की कार्रवाई को नैतिक रूप से सही बताकर अपनी दक्षिणपंथी विचारधारा वाली पहचान दिखाई है। ऐसा नहीं है कि हर कंजर्वेटिव उनकी तरह ही ट्रंप के योगदान की तारीफ करने में आगे था। नव-रूढ़िवादियों (नियोकॉन्स) के लिए, सत्ता बदलना एक विचारधारात्मक सोच थी। लेकिन अमेरिका को फिर से महान बनाने वाले (मागा) रूढ़िवादियों (कंजर्वेटिव्स) के लिए यह एक त्वरित साहसिक कार्य है, भले ही ट्रंप दावा करते हैं कि वह सिर्फ अपने 19वीं सदी के पूर्ववर्ती जेम्स मोनरो के सिद्धांत को अद्यतन कर रहे हैं, जो लैटिन अमेरिका को यूरोपीय उपनिवेशवाद से बचाना चाहते थे।


नया उपनिवेशवादी बीजिंग से नियंत्रित करता है। यह हमें एक ऐसे सवाल पर वापस लाता है, जो पक्के साम्राज्यवाद-विरोधी लोगों को नाराज करेगा : क्या साम्राज्यवाद नैतिक मूल्यों वाला हो सकता है? नील फर्ग्यूसन जैसे उच्च कुलीन ‘शाही’ इतिहासकार यह तर्क देंगे कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने उपनिवेशों को आधुनिक बनाया, जबकि अमेरिका ने अपनी शाही जिम्मेदारियों को बुरी तरह से छोड़ दिया है। वह विस्तारवाद के लिए नहीं, बल्कि लागू किए गए आदर्शवाद की बात कर रहे थे।


हाल में, अमेरिका अपनी नैतिक जिम्मेदारियों की कीमत पर अपनी घरेलू चिंताओं में सिमट रहा था, जिसका सबसे अच्छा उदाहरण ओबामा और बाइडन के कार्यकालों में देखा जा सकता है। ट्रंप भी शुरुआत में दुनिया से दूर रहते थे, जब तक कि दुनिया ऐसा मैदान न हो, जहां वह अपने प्रतिद्वंद्वी को धमका सकें। जैसा कि बेडेनोच कहती हैं, मादुरो के साथ उन्होंने साम्राज्यवाद को एक नैतिक संदर्भ दिया है, भले ही कुछ लोगों को यह तरीका गलत लगे। मादुरो के बिना दुनिया (ठीक वैसे ही जैसे सद्दाम के बिना) एक बेहतर जगह है। द रिपब्लिक ऑफ फियर (भय का गणराज्य) शब्द, जिसका इस्तेमाल असंतुष्ट लेखक कानन मकिया ने सद्दाम के इराक के लिए किया था, ऐसी किसी भी जगह पर लागू होता है, जहां यातना, भुखमरी, चुनाव में धांधली और बड़े पैमाने पर अमानवीयकरण के साधनों की देखरेख तानाशाह करता है। वामपंथ के उन रोमांटिक लोगों के लिए नहीं, जो बिना नायक वाली दुनिया में उदास होकर भटक रहे थे। लैटिन अमेरिका वह जगह थी, जहां उन्हें काफी वैचारिक हिम्मत मिल सकती थी, और जहां क्रांति एक शुद्ध थ्रिलर थी, जिसमें ऐसे क्रांतिकारी रहते थे, जो ईसा मसीह जैसे दिखते थे। अगर चे क्रांति के सर्वाधिक पूजे जाने वाले शहीद और पॉप कल्चर के सबसे ज्यादा बिकने वाले याद रखने लायक थे, तो सिगार पीने वाले शीर्ष नेता कास्त्रो ने सत्ता में रहते हुए सबसे बड़े साम्राज्यवाद विरोधी होने का रुतबा बनाए रखा। भले ही क्रांति को बनाए रखना सोशलिस्ट देश के लिए काफी मुश्किल था, फिर भी उन्होंने कम्युनिज्म की पहचान को जिंदा रखा, और दुनिया भर में वामपंथ को प्रेरित किया।


मादुरो के पूर्ववर्ती, ह्यूगो चावेज, कास्त्रो की नकल थे। चावेजवाद, व्यक्तिगत मिथक के इर्द-गिर्द बनाई गई वैचारिक प्रणाली, असल में, अमेरिका-विरोधी मर्दानगी थी, जिसमें मूल मुक्तिदाता सिमोन बोलिवर का आह्वान किया जाता था। चावेज ने ऐसे देश में खुद को कास्त्रो के हल्के संस्करण के तौर पर पेश किया, जो दुनिया के सबसे बड़े पेट्रोलियम भंडार होने के बावजूद आर्थिक रूप से टूट रहा था। लैटिन अमेरिका में हर तानाशाह ने मिथक बनाने की कला में महारत हासिल की, और वे सभी सिमोन बोलिवर का एक ताजा संस्करण बनना चाहते थे।


गेब्रियल गार्सिया मारखेज को अपनी किताब द जनरल इन हिज लेबिरिंथ में बोलिवर को इन्सान जैसा दिखाने, उन्हें उनके विशाल ऐतिहासिक कद से छोटा दिखाने में काफी मेहनत करनी पड़ी। कहानियों ने लैटिन अमेरिका के क्रूर इतिहास को नया जीवन दिया है, और कल्पना अब भी उसके ठेठ मुक्तिदाता-तानाशाहों का घर है, जैसे मारियो वर्गास ल्योसा की किताब द फीस्ट ऑफ द गोट में डोमिनिकन रिपब्लिक के राफेल ट्रुजिलो। मगर असलियत उतनी शानदार नहीं है; यह उतनी ही अजीब है जितनी कि ट्रंप की नकल करने वाले मादुरो का ‘नार्को-टेररिस्ट’ के तौर पर खत्म होना, जिसे साम्राज्यवाद के फरिश्तों ने रात में छापा मारकर उसके घर से उठा लिया। शायद यह 21वीं सदी के लिए भू-राजनीतिक जादुई यथार्थवाद है।edit@amarujala.com
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