फ्लोरिडा के न्यू कॉलेज में प्रोफेसर क्रिस हैसोल्ड ने 50 से ज्यादा वर्षों तक पढ़ाया था। छात्र-छात्राओं के प्रति उनका स्नेह कुछ ऐसा था कि उनकी डांट खाकर भी बच्चे उनके घर आया करते थे और उनकी मदद भी करते थे। डॉ. आर्चर याद करती हैं कि 1995 में एक महत्वाकांक्षी, किंतु दिशाहीन छात्रा के रूप में वह कॉलेज पहुंची थीं, और तब उन्होंने प्रोफेसर हैसोल्ड को संतरे के एक ढेर के साथ देखा था। उनके पूछने पर प्रोफेसर हैसोल्ड ने बताया कि ये सभी संतरे उन्होंने अपनी कक्षा के विद्यार्थियों के लिए लाए हैं।
खलील जिब्रान की आदर्श शिक्षक को लेकर कही गई बात-अगर शिक्षक वाकई बुद्धिमान है, तो वह छात्र को अपनी बुद्धि के घर में प्रवेश करने के लिए नहीं कहता, बल्कि वह उसे उसके ही मन की दहलीज तक ले जाता है-प्रोफेसर हैसोल्ड पर बिल्कुल सटीक बैठती थी। उनके छात्र और छात्राएं उनसे इस कदर जुड़ जाते थे कि कक्षा खत्म होने के बाद भी उनके शिक्षण सहायक के रूप में काम करना पसंद करते थे। डॉ. आर्चर कहती हैं, ‘जैसे मेरे पास पुस्तकों का संग्रह है, ठीक उसी तरह से प्रोफेसर हैसोल्ड के पास छात्र-छात्राओं का संग्रह था और यही उनकी पूंजी थी।’ 2016 में वह सेवानिवृत्त हो गईं, तब उनकी उम्र 85 साल थी। अपने अंतिम समय में वह अपने छात्रों से कहती थीं कि वह जब जाएंगी, तो सबके लिए कुछ न कुछ छोड़कर जाएंगी। वह कोई ऐसी महिला नहीं थीं, जो बड़ी आलीशान जिंदगी जीती हों।
उनकी ऐसी बातें सुनकर छात्र भावुक हो उठते थे। उनके निधन के कुछ ही समय बाद उनके पूर्व छात्र-छात्राओं को उनकी तरफ से एक-एक पैकेट मिला, जिसमें उन्हें एक बड़ी राशि मिलने की सूचना थी, लेकिन इसके पीछे प्रोफेसर हैसोल्ड का संदेश यह था कि ‘यहां कुछ ऐसा है, जो आपको आप बनने में मदद करेगा।’