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निक्सन से ट्रंप : एक भ्रम का अंत? बता रहे हैं शंकर अय्यर

शंकर अय्यर
Updated Tue, 11 Aug 2020 06:30 AM IST
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Donald trump - फोटो : PTI

इसे अमेरिका में 'द वीक दैट चेंज्ड द वर्ल्ड' के नाम से जाना जाता है। इस विचार को इस जुलाई में 49 वर्ष हो गए, जो गलतियों और मूर्खताओं पर आधारित था। 30 जून, 1971 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने ताइवान के अमेरिकी राजदूत को कहा कि वह ताइवानी सरकार को गठबंधन जारी रखने के लिए आश्वस्त करें। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि 'ऐसा हम अपने मित्रों के साथ नहीं करते।' संदर्भ था, अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर और चीनी प्रधानमंत्री चाउ एनलाई के बीच होने वाली आगामी बैठक का।



दस दिन बाद किसिंजर ने चाउ एनलाइ को बताया कि 'हमने ताइवान जलडमरूमध्य में गश्ती (पेट्रोलिंग) खत्म कर दी है, ताइवान से हवाई टैंकरों का एक स्क्वाड्रन हटा दिया है और अपने सैन्य सलाहकार समूह में 20 फीसदी की कटौती  कर दी है।' जुलाई, 1971 के अंत तक किसिंजर और निक्सन ने वही किया, जिसे राजनयिक रूप से किसी मित्र को बस के नीचे फेंक देना कहा जा सकता है। नवंबर, 1971 तक ताइवान संयुक्त राष्ट्र से बाहर हो गया। विश्व मंच पर सदस्यता के बगैर एक राष्ट्र।


वक्त का पहिया घूमता रहता है। पिछले हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन को संदेश देने के लिए अमेरिकी स्वास्थ्य मंत्री एलेक्स अजार को ताइवान भेजा। पिछले चालीस वर्षों में ताइवान की यात्रा करने वाले वह  पहले इतने उच्च स्तर के अधिकारी हैं। शुक्रवार को ट्रंप ने फिर से चुनाव जीतने के अपने अभियान में चीन को मुख्य खलनायक बनाने की कोशिश के तहत कई उपायों की घोषणा की। अमेरिका ने हांगकांग में 11 चीनी अधिकारियों और सहयोगियों पर प्रतिबंध लगा दिए, जिनमें हांगकांग के मुख्य कार्यकारी कैरी लैम भी हैं। ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश भी पारित किया, जिसमें अमेरिकी कंपनियों और निवासियों को चीनी स्वामित्व वाले टिकटॉक और वीचैट ऐप के साथ कोई भी कारोबार करने से प्रतिबंधित किया गया है।


निक्सन द्वारा तैयार और किसिंजर द्वारा संपादित परिकल्पना का उद्देश्य चीन को सोवियत संघ के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट खेमे से अलग करना था। तथ्य यह है कि यह खेमा केवल भय के कारण एकजुट था। चीन की सबसे बड़ी आशंका थी विघटन।


निक्सन ने इस विचार की कल्पना 1967 में की थी, जब राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में उन्होंने एक आलेख में कहा था, 'हम राष्ट्रों के परिवार के बाहर हमेशा के लिए चीन को छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं, जिससे वह अपनी कल्पनाओं और नफरतों का पोषण करने लगे तथा अपने पड़ोसियों को धमकाए।' इसके लगभग आधी सदी बाद अमेरिका अपने चुनाव में चीन पर हस्तक्षेप का आरोप लगा रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो मानते हैं कि 'शी जिनपिंग एक दिवालिया अधिनायकवादी विचारधारा के सच्चे विश्वासी हैं तथा आधिपत्य का मंसूबा रखते हैं।' सबसे बड़ी विडंबना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट सी. ओ'ब्रायन कहते हैं कि 'चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग खुद को जोसेफ स्टालिन के उत्तराधिकारी के रूप में देखते हैं।' 


इस कहानी में सबसे उल्लेखनीय वह कथा है, जिसका उपयोग निक्सन एवं उनके सहयोगियों ने किया था। 'जीवन, स्वतंत्रता और खुशी की खोज' के सिद्धांतों पर खड़े दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र ने पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह याह्या खान और रोमानिया के कुख्यात तानाशाह निकोलाई चाउसेस्कू की मदद से चीन (एक अधिनायकवादी देश, जो माओ के सामूहिक निगरानी, दमन और मानवाधिकार उल्लंघन के लिए कुख्यात है) को गले लगाया।


भारत-अमेरिकी संबंध संदर्भगत जड़ता का शिकार है। अमेरिकी प्रतिष्ठान अक्सर सोवियत संघ के साथ भारत के संबंधों का जिक्र करता है। जो बात वह नहीं समझते हैं, वह यह है कि अमेरिकी-चीनी नजदीकी ने ही भारत को सोवियत मैत्री संधि की तरफ धकेला। अलेक्सई कोसिगिन ने सितंबर, 1969 में संधि की पेशकश की थी, लेकिन इंदिरा गांधी ने नौ अगस्त, 1971 तक इसे टाला, जब किसिंजर ने नई ट्रोइका और निक्सन के बेशर्म पूर्वाग्रह की रूपरेखा पेश की। पांच दशकों तक अमेरिका ने चीन को बढ़ावा दिया, उसके साथ व्यापार शुरू किया और यहां तक कि विश्व व्यापार संगठन में उसे प्रवेश दिलाया।
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अमेरिका में चीनी निर्यात 1985 में 3.5 अरब डॉलर था, जो 2019 में बढ़कर 557 अरब डॉलर हो गया। दुनिया की फैक्टरी के रूप में यह निर्यात में 25 खरब डॉलर और जीडीपी में 150 खरब डॉलर का दावा करता है। अमेरिकी शासकों द्वारा मानवाधिकार एवं लोकतंत्र के बारे में तमाम धमकियों के बावजूद उसकी अपनी कंपनियों ने लाभ की मंशा और राजनीति के बीच एक चीनी दीवार खड़ी की है।


इस बीच, चीन ने अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए अपनी आर्थिक ताकत का लाभ उठाया। चीन ने यह कैसे किया, इसे एक लाइव कार्यक्रम के द्वारा बेहतर ढंग से विश्लेषित किया जा सकता है, जिसको लेकर हॉलीवुड स्टार लियोनार्दो दी कैप्रियो और अन्य वन्यजीव उत्साहियों ने सवाल उठाए थे। हर साल, चीनी पर्यटक गैलापागोस द्वीप समूह से शार्क की लुप्तप्राय प्रजातियों का शिकार करते हैं। तकनीकी रूप से यह द्वीप इक्वाडोर के समुद्र के भीतर हैं। चीनी जहाज इक्वेडोर के समुद्र से लुप्तप्राय शार्क को अंतरराष्ट्रीय जल में लाने के लिए चारे का उपयोग करते हैं और इन शार्क को पकड़कर चीन और अन्य जगहों पर बेचते हैं।


ट्रंप युग में अनोखी द्विदलीय जागरुकता बढ़ते कर्ज, घाटे और असमानता से उपजी है, और लगता है कि इन्हीं के कारण नौकरी एवं विकास का अपहरण हो गया है। चीन के साथ अपने जुड़ाव के चलते अमेरिका ने अपनी बचत, निवेश, प्रौद्योगिकी और नौकरियों का निर्यात किया।


अमेरिका अब नए गठजोड़ की कोशिश कर रहा है - भले ही उन कंपनियों के साथ, जो 5 जी तकनीक की आपूर्ति कर सकती हैं, उत्पादों की आपूर्ति शृंखला और निवेश में मदद कर सकती हैं। भारत के साथ नई समुद्री सुरक्षा साझेदारी अमेरिका की नई धुरी की रणनीति का हिस्सा है। भारत को इसके लिए अनुकूल रणनीति का चयन करना होगा। यह सच है कि नीति और राजनीति के लिए मौजूदा प्रसंग महत्वपूर्ण है। इसी तरह विरासत और इतिहास भी। लगभग आधी सदी बाद ट्रंप ‘चीनी कम’ कह सकते हैं, पर गलत अवसरवाद से छुटकारा आसान नहीं होगा। छुटकारे की राह लंबी और कठिन है।

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