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इधर अमेरिका, उधर चीन: महाशक्तियों की दुश्मनी भी उतनी ही खतरनाक है, जितनी कि उनकी दोस्ती

रहीस सिंह (अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार) Published by: ज्योति भास्कर Updated Tue, 27 Oct 2026 03:20 AM IST

सार

जब महाशक्तियां वैश्विक नियमों को दरकिनार कर रही हों, तब बची हुई दुनिया की मझोली ताकतों के सामने ज्यादा रास्ते नहीं बचते। दिक्कत यह है कि महाशक्तियों की दुश्मनी भी उतनी ही खतरनाक है, जितनी कि उनकी दोस्ती।
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अंततराष्ट्रीय भू-राजनीति में तेजी से बदल रही तस्वीर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स


दरअसल, यह प्रश्न इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि अब से करीब नौ महीने पहले कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने मझोली ताकतें को एकजुट होने का आह्वान किया था, वह भी दावोस के विश्व आर्थिक मंच से। कार्नी का कहना था कि यह ऐसा दौर है, जिसमें पुरानी नियम आधारित विश्व व्यवस्था शक्तिशाली देशों पर अंकुश नहीं लगा पा रही है। इसलिए, ताकतवर देश कमजोरों को अपना शिकार बनाने में सफल हो जा रहे हैं। उनका यह भी कहना था कि यदि मझोली ताकतें गठबंधन बनाकर संयुक्त कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति नहीं जुटा पाईं, तो वे महाशक्तियों की दावत की मेज पर ‘परोसे जाने वाले मीनू’ की हैसियत में रह जाएंगी। इस निष्कर्ष को इसलिए भी स्वीकार किया जा सकता है, क्योंकि अमेरिका और चीन भरोसे लायक नहीं हैं। ये दोनों अपने हितों के अनुरूप नियम आधारित व्यवस्था को अपनाते और दरकिनार करते हैं। ऐसे में, क्या मझोली ताकतों के एकजुट होने की उम्मीद की जा सकती है?


इसकी पहली वजह यह है कि आह्वान कनाडा की तरफ से किया गया और कनाडा उस पश्चिमी दुनिया का हिस्सा है, जो दशकों तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था के एक सुविधाजनक विस्तार का हिस्सा रहा है। दूसरी वजह पश्चिमी दुनिया के भू-राजनीतिक व आर्थिक हित वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) से अलग हैं और अधिकांश मझोली ताकतें इसी ग्लोबल साउथ से आती हैं। हालांकि, पिछले कुछ दिनों या महीनों में कई मौकों पर मझोली ताकतों ने आक्रामक रूप से कुछ देशों का सामना किया और बिना गंभीर नुकसान उठाए उससे बाहर भी निकल आईं। खासकर, जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर आक्रमण करने की धमकी दी और रास्ते में आने वाले किसी भी देश पर विनाशकारी शुल्क लगाने का संकल्प दोहराया, तब यूरोपीय नेता डेनमार्क और उसके अधीन स्वशासित क्षेत्र ग्रीनलैंड के समर्थन में आ खड़े हुए। तब मजबूरी में, ट्रंप को अपनी महत्वाकांक्षा से अलग अधिक व्यापक सुरक्षा समझौते की दिशा में कदम बढ़ाना पड़ा।


अब एशिया को देखें, जहां चीन एक ऐसे दैत्य की तरह आकार बढ़ा रहा है, जिसकी भूख असीमित है, लेकिन वह अपने अंदर बहुत-सी चुनौतियों से भी जूझ रहा है। यही चुनौतियां उसे बाहरी दुनिया में और आक्रामक व कुटिल होने के लिए प्रेरित करती हैं, ताकि वह अपने भीतर पनपने वाले प्रतिरोधों को कुचल सके, वह भी बिना किसी आवाज के। फिर भी आवाज तो उठेगी, उठी भी। ऐसी पहली सशक्त आवाज जापान की प्रधानमंत्री साइने ताकाइची की तरफ से उठी, जिन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि ताइवान पर चीन का हमला जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल देगा। यूरोप, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और एशिया के मझोली ताकतों वाले देशों में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। इसके बावजूद, मझोली ताकतें की प्रतिरोधात्मक शक्ति की तुलना में उनकी कमजोरी कहीं ज्यादा दिख रही है, लेकिन क्यों?


दरअसल, वैश्विक दक्षिण के अनेक देश अमेरिका को दबंग के रूप में देखते हैं, लेकिन पश्चिम के आत्मकेंद्रित देशों के साथ उसके खिलाफ नहीं खड़े हो सकते। वैसे भी, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और भारत जैसी क्षेत्रीय ताकतें किसी एक पक्ष का साथ देने के बजाय दोनों के बीच संतुलन साधने की रणनीति अपनाती हैं। यही वजह है मझोली ताकतें कभी वाशिंगटन के साथ जुड़ने की कवायद करती हुई नजर आती हैं, तो कभी बीजिंग के साथ। मझोली ताकतों से नीचे कुछ छोटे देश भी हैं। वे ऐसी महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों पर नियंत्रण रखते हैं, जिनका विकल्प आसानी से उपलब्ध नहीं है। मसलन, नीदरलैंड व ताइवान, दोनों ही ऐसी कंपनियों के केंद्र हैं, जिन्हें सेमीकंडक्टर की वैश्विक आपूर्ति-शृंखलाओं में बदला नहीं जा सकता। इन देशों पर दोनों शक्तियां गिद्ध दृष्टि लगाए हुए हैं। ऐसे में, सवाल यह है कि यदि इन देशों पर महाशक्तियों का हमला हुआ, तो क्या मझोली ताकतें इन्हें बचाने के लिए एकजुट होकर आगे आएंगी? उत्तर है, नहीं। क्यों? शायद इसलिए, क्योंकि वे यह मानकर चल रही हैं कि सुरक्षा के लिए महाशक्ति के बगल में खड़े रहना जरूरी है।


जो भी हो, दुनिया की ‘महाशक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता’ चल रही है और इस प्रतिद्वंद्विता का शिकार अंततः मझोली ताकतों को होना है। अगर इन दोनों के बीच मित्रता हो गई, तब भी शिकार इन्हें ही होना पड़ेगा। दरअसल, इन मझोली ताकतों में दो तरह की प्रतिस्पर्धा रहती है। पहली आगे निकलने की और दूसरी किसी एक महाशक्ति के साथ खड़े होने की। वैसे भी अब ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ जैसी एकजुटता की संभावना न के बराबर है। यही वजह है कि महाशक्तियां ‘लव एंड हेट’ का गेम खेलती रहती हैं, ताकि मझोली ताकतें विभाजित रहें और इनका काम बनता रहे। आप देख सकते हैं कि ट्रंप अमेरिका में मध्यावधि चुनावों से पहले ईंधन की कीमतें घटाने के लिए पुतिन से डीजल खरीद रहे हैं और यूक्रेन को सैन्य सहायता में कटौती करने की धमकी दे रहे हैं। अमेरिका और चीन के बीच भी वैसी लड़ाई नहीं है, जो अवधारणा के स्तर पर जमी हुई है। राजनयिक तो ‘जी-2’ की बात करते हैं, यानी दुनिया की दो बड़ी ताकतों की विशिष्ट जोड़ी।


इस भू-राजनीतिक स्थिति पर सिंगापुर के संस्थापक रहे ली कुआन यू ने काफी पहले टिप्पणी की थी-‘जब हाथी लड़ते हैं, तो घास कुचली जाती है।’ महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी इस चेतावनी का दूसरा हिस्सा भी है, जिसका उल्लेख कम किया जाता है, अर्थात ‘जब वे प्रेम करते हैं, तब भी घास ही कुचली जाती है।’ इसलिए, मझोली ताकतों को इन दोनों की दोस्ती व दुश्मनी, दोनों को गौर से देखना होगा और उससे बचना भी। पर, ऐसा लगता नहीं है कि वे बच पाएंगी, क्योंकि टोक्यो की तरह कई अन्य देश भी यही सोच रखते हैं कि चीन को रोकने की क्षमता केवल अमेरिका के पास है। हालांकि, मझोली ताकतों के बीच हुआ मक्का समझौता, जिसके जरिये पाकिस्तान, सऊदी अरब व तुर्किये सामूहिक रक्षा गठबंधन का हिस्सा बने, तमाम नाउम्मीदों के बीच टिमटिमाता हुआ चिराग न सही, पर जुगनू जैसा तो है ही।

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