राष्ट्रपति ट्रंप को लगता था कि चीन अमेरिका से जितना आयात करता है, उससे अधिक अमेरिका को निर्यात करता है। इसलिए, उन्होंने जल्दबाजी में चीन के खिलाफ उच्च टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी। मगर वह यह समझने में विफल रहे कि चीन सोयाबीन जैसी जिन वस्तुओं की खरीद अमेरिका से करता है, उन्हें वह आसानी से अन्य देशों से भी हासिल कर सकता है। दूसरी ओर, बीजिंग अब दुर्लभ मृदा खनिजों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन चुका है, जिनके लिए अमेरिका के पास कोई वैकल्पिक स्रोत नहीं है।
वर्तमान में चीन दुनिया के लगभग 90 फीसदी दुर्लभ मृदा खनिजों पर नियंत्रण रखता है। वह छह भारी दुर्लभ मृदा खनिजों का एकमात्र आपूर्तिकर्ता है और दुर्लभ मृदा चुंबकों के क्षेत्र में भी उसका लगभग पूरा दबदबा है। दुर्लभ धातुएं और उनसे बने चुंबक आधुनिक उद्योग जगत के अनिवार्य घटक हैं। ये ड्रोन, ऑटोमोबाइल, हवाई जहाज, पवन टर्बाइन के अलावा विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक और सैन्य उपकरणों के निर्माण के लिए बेहद जरूरी होते हैं। इनके बिना कई अमेरिकी कारखाने बंद हो सकते हैं और इसका सीधा असर सैन्य आपूर्तिकर्ताओं पर भी पड़ेगा। एक पनडुब्बी निर्माण में लगभग चार टन तक दुर्लभ धातुओं की आवश्यकता होती है।
ऐसे में, यह प्रत्याशित ही था कि किसी विवाद की स्थिति में चीन दुर्लभ धातुओं पर अपने नियंत्रण को हथियार के रूप में इस्तेमाल करेगा, जैसा उसने 2010 में जापान के साथ किया था। और हुआ भी वही। ट्रंप द्वारा टैरिफ घोषणा के महज दो दिन बाद ही चीन ने कुछ मृदा खनिजों पर निर्यात प्रतिबंध लागू कर दिया, जिसे इस महीने बढ़ा भी दिया गया। जल्द ही यह साफ हो गया कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिका को अपने नियंत्रण में ले लिया है, क्योंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था चीन की दुर्लभ मृदा धातुओं पर उससे कहीं अधिक निर्भर है, जितना चीन अमेरिकी सोयाबीन पर है।
इस समझौते के अनुसार, अमेरिका ने तत्काल प्रभाव से टैरिफ में दस फीसदी की कटौती की है, बदले में चीन ने फिर से अमेरिका से सोयाबीन खरीदने, दुर्लभ मृदा खनिजों का निर्यात जारी रखने और फेंटानिल के अवैध व्यापार के खिलाफ कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। सतही तौर पर यह स्थिति व्यापारिक युद्ध से पहले की सामान्य अवस्था में लौटने जैसी लग सकती है, पर अमेरिका का यह कदम आत्मसमर्पण करने और व्यापार युद्ध में कमजोर पड़ने जैसा ही है, जिसकी शुरुआत उसने खुद की थी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस विवाद ने चीन को अपने दुर्लभ मृदा खनिजों पर नियंत्रण को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने और इसे अनिश्चितकाल तक अमेरिका पर दबाव बनाने का अवसर दिया।
हाल ही में, एक सम्मेलन में, मैंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों से पूछा कि कौन सोचता है कि अमेरिका व्यापार युद्ध जीत रहा है, कौन मानता है कि चीन जीत रहा है और कौन कहता है कि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी? अधिकांश विशेषज्ञों का मानना था कि चीन इस संघर्ष में स्पष्ट रूप से आगे है और अब उसके पास निर्णायक बढ़त मौजूद है। ट्रंप ने ऐसे समय में चीन को दुर्लभ मृदा खनिजों को हथियार बनाने के लिए उकसाया, जब अमेरिका के पास उसका वैकल्पिक स्रोत खोजने का कोई तरीका नहीं है। वास्तव में, पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी राष्ट्रपतियों को दुर्लभ मृदा की खदानों और रिफाइनरियों के विकास के लिए और भी कड़ी मेहनत करनी चाहिए थी। कनाडा स्थित प्रमुख खनन कंपनी पावर मेटालिक माइंस के सीईओ टेरी लिंच ने मुझे बताया कि पश्चिम को दुर्लभ मृदा क्षमता विकसित करने के लिए मैनहट्टन प्रोजेक्ट के स्तर की मुहिम की आवश्यकता है, लेकिन इतनी व्यापक पहल के बाद भी परिणाम सामने आने में संभवतः पांच से सात साल लगेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि इस अंतरिम समय में अमेरिका को चीन के साथ समझौता करना ही पड़ेगा।
असल में, ट्रंप ने व्यापार युद्ध शुरू किया और जल्द ही उन्हें महसूस हुआ कि वह टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन यह उन पर ही भारी पड़ा, या यूं कहें कि शिकारी खुद शिकार हो गया। इसलिए, उन्होंने चीन को कुछ रियायतें देने की दिशा में कदम बढ़ाया। ट्रंप ने चीन को चिप निर्यात करने के नियमों में ढील दी। गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के बावजूद उन्होंने टिकटॉक को अमेरिका में प्रतिबंधित नहीं किया। उन्होंने ताइवान के राष्ट्रपति के अमेरिकी दौरे को रोक दिया और उसे हथियार बेचने में भी देरी की। जैसा कि सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोग्रेस ने कहा है कि चीन के प्रति ट्रंप प्रशासन की नीति एक रणनीतिक गिरावट में जा पहुंची है।
शी जिनपिंग अमेरिका की कमजोरी से वाकिफ हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि द्विपक्षीय संबंधों में उनका पलड़ा अमेरिका से भारी है और ट्रंप कमजोर हैं, जो दबाव में सुरक्षा से जुड़े मामलों में झुक जाएंगे। भले ही चीन दुर्लभ धातुओं के निर्यात जारी रखने पर सहमत हो गया है, लेकिन इस बात की उम्मीद कम है कि वह अमेरिका को इन धातुओं के लिए भंडार बनाने की अनुमति देगा। असल में शी जिनपिंग जो कर रहे हैं, वह किसी हद तक वही है, जो अमेरिका पहले चीन के साथ करता आया है।
महान सैन्य रणनीतिकार सुन त्जू ने अपनी पुस्तक द आर्ट ऑफ वार में लिखा था कि 100 लड़ाइयों में 100 जीत हासिल करना कौशल की सर्वोच्च सीमा नहीं है। असली कौशल तो बिना लड़े ही दुश्मन को परास्त करना है। शायद यही तरीका शी जिनपिंग भी अपना रहे हैं। इस बैठक में ताइवान के मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं हुई, जो चीन की बढ़त को दर्शाता है। इसलिए, ट्रंप व जिनपिंग के बीच हुए समझौते को देखकर खुश होने की जरूरत नहीं है। हकीकत यह है कि इससे अमेरिका महज एक व्यापार युद्ध नहीं हारा, बल्कि काफी हद तक अपनी वैश्विक साख और प्रभाव को भी खोया है। दुनिया इसे अमेरिका के पतन के संकेत के रूप में देख सकती है।
©The New York Times 2025