जो लोग शहरीकरण का विरोध करते हैं, वे परोक्ष रूप से पलायन की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे होते हैं। उत्तर और दक्षिण भारत में जो फर्क है उसकी वजह है कि दक्षिण में भले आर्य विरोधी, ब्राह्मण विरोधी और उत्तर विरोधी सरकारें रही हों, लेकिन उन्होंने कभी शहरीकरण का विरोध नहीं किया।
एक फर्क बिहार से आने वाली ट्रेनों में देखा जा सकता है, जिसमें यात्री ठुसे होते हैं। मानो पूरा रेलवे का दलाल तंत्र बिहार और पूर्वांचल की पलायन प्रवृत्ति के कारण चलता है। ऊपर से तुर्रा यह कि बिहार के मुख्यमंत्री को मलाल है कि बिहार के पिछड़े होने के बावजूद केंद्र से उसका वाजिब हिस्सा नहीं मिलता है।
जवाहरलाल नेहरू जब प्रधानमंत्री थे, तब पूर्वांचल के एक मुखर सांसद लोकसभा में पूर्वांचल की गरीबी का रोना रोते हुए बताने लगे कि कैसे उनके गांव के लोग पशुओं के गोबर से दाने तलाश कर पेट भरते हैं। कोई भी इस गरीबी और बदहाली को सुनकर पसीज जाएगा। लेकिन इस गरीबी को दूर करने का हल क्या है? इसे जानने की कोशिश न तो कभी उन सांसद महोदय ने की और न ही सरकार ने इस गरीबी को जड़ मूल से उखाड़ फेकने की पहल की।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय इस रूढ़ि को तोड़ा गया था।
उस समय स्वर्णिम चतुर्भुज योजना को अमल में लाकर सड़कों का जाल बिछाने का एक बड़ा काम किया गया। सड़कें गांवों का शहरीकरण करने में सर्वाधिक उपयुक्त हैं। वे सुगम परिवहन का एक जरिया तो हैं ही, अपने किनारे के गांवों को जल्दी ही कस्बाई स्वरूप दे देती है। जबकि ट्रेनें अनजान रास्तों से गुजर जाती हैं और ट्रेन यात्रियों को सिवाय पटरियों के किनारे पड़ने वाले गांवों का एक छायावादी लुक देने के सिवा किसी का भला नहीं करतीं। पर पिछले नौ वर्षों से वह स्वर्णिम चतुर्भुज योजना फिर फाइलों में डंप होकर रह गई है।
जो सड़कें बन गई थीं, उन पर टोल टैक्स वसूलने का काम तो यथावत चालू है, लेकिन इन सड़कों पर से गुजरने वाले वाहन चालकों और यात्रियों को उसके अनुरूप सुविधाएं नहीं दी जाती हैं। इसीलिए हर जगह टोल का विरोध हो रहा है और कहीं-कहीं तो किसान प्रदर्शन कर महीनों तक टोल का काम ठप करवा देते हैं। इसका एक उदाहरण मेरठ के पास का सिवाया टोल है, जहां भारतीय किसान यूनियन ने महीनों तक टोल वसूली का काम रुकवा दिया था।
दिल्ली से कोलकाता तक जाने वाला एनएच-2 राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की सर्वाधिक महत्वाकांक्षी योजना थी। इस सड़क के बन जाने से तमाम कस्बे शहरों में तब्दील हो गए और गांव कस्बों में। अभी कुछ वर्षों पहले तक दिल्ली के लोग पलवल, कोसी, मथुरा या आगरा में बसने की सोच नहीं सकते थे, आज वहां जमीनों के रेट दिल्ली से टक्कर ले रहे हैं। यही हाल एनएच-8 का है। वहां गुड़गांव दिल्ली की तुलना में महंगा है और लोग-बाग भिवाड़ी व बहरोड तक रहने के लिए जा पहुंचे हैं। दिल्ली से अंबाला व अमृतसर मार्ग पर पड़ने वाले सोनीपत, पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला का भी ऐसा ही विकास हुआ है।
दिल्ली से बाहर जाकर रहने का मतलब है, दिल्ली का बोझ घटना व अन्य कस्बों का शहरीकरण। अगर यही हाल बिहार के शहरों और पूर्वांचल के शहरों का हो जाए, तो कौन आएगा इस बेदिल दिल्ली में। पर इसके साथ ही उद्योगों को बढ़ावा देने तथा रोजगार सृजित करने वाले उद्योगों को तत्काल मंजूरी देने का काम वन विंडो से शुरू करना होगा। फिर न बिहार पिछड़ा होगा, न पूर्वांचल, न बुंदेलखंड। रोज-रोज केंद्र के समक्ष कटोरा लेकर खड़े होने से अच्छा है कि अपना विकास स्वयं करो।
बिहार में विकास पुरुष के प्रतीक बने नीतीश कुमार ने बिहार से कितना पलायन रोका? गुजरात और महाराष्ट्र ने जो रास्ता बहुत पहले दिखा दिया था, वह नीतीश और अखिलेश क्यों नहीं दिखा पा रहे हैं? जबकि दोनों ही आधुनिक विकास के पैरवीकार हैं। मायावती ने एक कोशिश की थी, पर उसकी वजह शायद उनका उत्तर प्रदेश की होने के बजाय दिल्ली निवासिनी होना था। अगर बिहार में रोजगार मिलने लगे, तो शायद वहां से पलायन ठप हो जाए। अगर अब तक ऐसा नहीं हुआ, तो पूर्व की कांग्रेसी सरकारें, फिर लालू व उनकी पत्नी की सरकार से नीतीश खुद को बेहतर कैसे बता रहे हैं?