बहुचर्चित खाद्य सुरक्षा विधेयक को लेकर संप्रग सरकार अचानक सक्रिय हो गई है। उसे अगले संसदीय चुनाव के लिए एक जिताऊ एजेंडे की तलाश है।
बीते चार साल का जायजा लें, तो साफ है कि यूपीए सरकार के खाते में कामयाबी से ज्यादा नाकामियां हैं। ऐसे में सरकार को अब खाद्य सुरक्षा और कैश-ट्रांसफर जैसी अपनी खास योजनाओं का ही आसरा है।
खाद्य सुरक्षा के लिए कभी अध्यादेश की बात हो रही है, तो कुछेक हलकों से संसद सत्र पहले बुलाने का सुझाव आ रहा है। विपक्षियों और सरकार के कुछ सहयोगियों ने विधेयक के मौजूदा प्रारूप पर सवाल उठाकर सरकार के रास्ते में रोड़ा अटकाने की कोशिश की है।
कांग्रेस इन ‘विघ्न संतोषियों’ से बेहद खफा है। लेकिन खाद्य सुरक्षा विधेयक को लंबे समय तक लटकाए रखने की असल गुनहगार तो वह स्वयं है।
सामाजिक-राजनीतिक मामलों को लेकर अपने यहां लोगों की याददाश्त कमजोर होती है। सरकार ने जून, 2009 में ही ऐलान किया था कि खाद्य सुरक्षा विधेयक तुरंत लाया जा रहा है और इसके जरिये सभी को खाद्य सुरक्षा की गारंटी की जाएगी।
सरकार गठन के बाद संसद के पहले सत्र में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक के अपने पहले संबोधन में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भाषण के 24वें पैरे में खाद्य सुरक्षा विधेयक को कानूनी जामा पहनाने का ऐलान किया था।
संसद सत्र के दौरान राष्ट्रपति के संबोधन को सरकार का नीतिगत दस्तावेज माना जाता है। सरकार से पूछा जाना चाहिए कि बीते चार वर्षों में इस दिशा में उन्होंने क्या किया!
क्या हमारे गणतंत्र में सरकार और सत्तारूढ़ दल को गरीबों, भूखों और बेहालों की याद सिर्फ चुनाव से पहले आती है? घोषणा के मुताबिक संप्रग नेतृत्व को सरकार गठन के सौ दिन के भीतर यह विधेयक पारित कराना चाहिए था।
लोगों को यह भी याद नहीं रह गया है कि शुरुआती दौर में सरकार की तरफ से विधेयक के लिए जो सुझाव सामने लाए गए, वे विधेयक के मौजूदा संशोधित प्रारूप से कहीं ज्यादा संतुलित और व्यापक थे।
देश के कई राज्यों में जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत इससे ज्यादा बेहतर प्रावधान पहले से लागू हैं। ऐसे में यह विधेयक भूखे-बेहाल लोगों के साथ कितना न्याय करेगा! निस्संदेह, देश को एक संतुलित और व्यापक दायरे वाले खाद्य सुरक्षा विधेयक की जरूरत है।
पर विधेयक के नाम पर इन दिनों सत्ताधारी खेमे और विपक्षी दलों के बीच जिस तरह का सियासी-खेल चल रहा है, वह भूखों, गरीबों और बेहालों के साथ भद्दा मजाक है। इसका मकसद सिर्फ चुनावी रोटी सेंकना है।
स्वयं सरकार के शीर्ष योजनाकारों को भी इस बात का एहसास है कि विधेयक पर कोशिश देर से शुरू हुई। खाद्य सुरक्षा के लिए अध्यादेश आए या विधेयक को संसद में मंजूरी मिले, चुनाव से पहले इसे लागू कर योजना का लाभ जन-जन तक पहुंचाना अभी संभव नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे सूबों में तो और भी मुश्किल होगी। कांग्रेस की हालत उन इलाकों में नाजुक है और वहां उसे गरीबों के वोटों की सबसे ज्यादा दरकार है।
दक्षिण के सूबों के मुकाबले वहां जन वितरण प्रणाली खस्ताहाल है। जरूरतमंदों को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने के लिए वैकल्पिक तंत्र कहां से आएगा? अगले संसदीय चुनाव तक इसके लिए कारगर तंत्र खड़ा कर लेना मौजूदा नौकरशाही के वश की बात नहीं।
सरकार की तरफ से कोशिश हो रही है कि खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक के अब तक पारित न होने के लिए विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहराया जाए।
पर सरकार क्यों नहीं बताती कि उसने जितनी दिलचस्पी मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई या कोयला आवंटन के अपने विवादास्पद फैसलों के बचाव में दिखाई, उतनी खाद्य सुरक्षा या भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक में क्यों नहीं? शुरू में कांग्रेस इस भ्रम का भी शिकार थी कि राहुल गांधी को आगे कर वह संसदीय चुनाव की नैया पार कर लेगी। पर उसका भ्रम जल्दी ही दूर हो गया।
पार्टी नेताओं को भी इस बात का एहसास हो चुका है कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में घिरी सरकार की छवि अगर इसी तरह बिगड़ती रही, तो नतीजे उतने ही बुरे होंगे।
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राज्यों की सरकारों के खिलाफ जनाक्रोश जरूर भड़कता है, पर महंगाई के सवाल पर राज्य सरकारें उतनी बदनाम नहीं होतीं, जितनी केंद्र की सरकार। लोगों को मालूम है कि बड़े आर्थिक फैसले केंद्रीय स्तर पर होते हैं।
अगर सरकार अपने बारे में लोगों की राय बदलना चाहती है, तो उसे विज्ञापन-प्रचार अभियान के बजाय अपनी अर्थनीति और ठोस कार्यक्रमों पर विचार करना होगा।
अच्छी बात है कि चुनाव से पहले सरकार को अपनी छवि की चिंता हो रही है। पर उसकी छवि विपक्षी दलों के किसी प्रयास के बगैर लगातार बिगड़ रही है। चूंकि यूपीए कांग्रेस के प्रभुत्व की सरकार है, इसलिए इस सरकार का हर संकट वस्तुतः कांग्रेस का अपना संकट है।
ऐसा लगता है कि कुछ योजनाओं की सफलता के गुणगान और लोकप्रियतावादी फॉर्मूलों से सरकार भ्रष्टाचार और महंगाई पर केंद्रित मौजूदा राजनीतिक विमर्श या बहस को बदलने की कोशिश करना चाहती है। पर ‘कोलगेट’ और ‘रेल घूस कांड’ के बाद निकट भविष्य में इस तरह के कुछ और खुलासे हो गए, तो हालात और बुरे होंगे।
समय इतना कम है कि सिर्फ दो-एक लोकप्रियतावादी विधेयकों और भारत-निर्माण के करोड़ों के बजट वाले रंगारंग विज्ञापनों से मौजूदा राजनीतिक तस्वीर को बदलना संभव नहीं होगा। क्या कांग्रेस के पास अब भी कोई करिश्माई फॉर्मूला है?