सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि अधिकांशतः बच्चे उन्हीं लोगों द्वारा यौन हिंसा का शिकार होते हैं, जिन पर उन्हें भरोसा होता है। दुनिया भर में हुए अध्ययन बताते हैं कि बाल यौन उत्पीड़न की घटनाओं में शामिल दो-तिहाई से अधिक अपराधी कोई परिचित ही होता है, जो इससे निपटने के लिए एक बड़ी चुनौती है।
भरोसेमंद रिश्तेदारों द्वारा किए जाने वाले यौन अपराधों के कारण ऐसे मामले पारिवारिक प्रतिष्ठा बचाने की सोच के तहत दबा दिए जाते हैं। लेकिन ऐसे मामले बच्चों के मन में ऐसा गहरा घाव करते हैं कि जीवन भर वे उनका दंश नहीं भूल पाते। कुछ हद तक लड़कियों के प्रति यौन दुर्व्यवहारों को लेकर समाज संवेदनशील भी दिखता है और उसके मामले भी जागरूकता बढ़ने के चलते अब पहले की अपेक्षा ज्यादा दर्ज होने लगे हैं, लेकिन लड़कों के प्रति यौन शोषण के मामले को ज्यादा संवेदनशीलता से नहीं लिया जाता। अगर लड़कों के यौन शोषण को भी उसी संवेदनशीलता के साथ रोकने की कोशिश नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में अवसादग्रस्त पुरुषों की संख्या इतनी बढ़ जाएगी कि उसकी गणना करना संभाव नहीं होगा।
साइकियाट्रिक टाइम्स में अप्रैल 2020 में छपा ‘द अदर मी टू : मेल सेक्सुअल एब्यूज सरवाइवर्स’ अध्ययन बताता है कि किशोर लड़कों के प्रति समाज कहीं अधिक निष्ठुर तरीके से सोचता है और यह मानकर चलता है कि चूंकि किशोरों के यौन शोषण से उनकी यौन शुचिता भंग नहीं होती, इसलिए यह चर्चा का विषय नहीं होना चाहिए। हमें समझना होगा कि यौन शोषण कभी भी लिंग आधारित पीड़ा नहीं है। यौन शोषण से जितना किसी लड़की को नुकसान पहुंचता है, उतनी ही पीड़ा लड़कों को भी होती है।
शोध बताते हैं कि कैसे यौन शोषण के उपरांत उच्च तनाव स्तर और आघात बच्चों के मस्तिष्क के रसायनों, मस्तिष्क संरचना और यहां तक कि जीन अभिव्यक्ति को भी बदल सकता है। ‘जर्नल ऑफ साइकोलॉजी’ में प्रकाशित निष्कर्षों के अनुसार, मानसिक विकारों से पीड़ित 20 से 40 प्रतिशत लोगों का बचपन में यौन शोषण हुआ होता है। यही नहीं इंडस्ट्रियल साइकियाट्री जर्नल में 2017 में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि यौन शोषण के शिकार किशोर, संबंधों के प्रति नकारात्मकता का भाव रखते हैं तथा रिश्तों के प्रति अविश्वास और उदासीनता बरतने लगते हैं, जिससे सामान्य जीवन जीने में बाधा उत्पन्न होती है।
यौन उत्पीड़न के लिए बने तमाम कानूनों के बीच इस कलंक को समाप्त करने के लिए सामाजिक चेतना की आवश्यकता है। यौन शोषण को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ना इस समस्या की विकरालता का एक अहम कारण है। परिचितों द्वारा शोषित होने वाले अधिकांश बच्चे लंबे समय तक यह समझ ही नहीं पाते कि उनके साथ यौन दुर्व्यवहार हो रहा है, क्योंकि अपराधी पीड़ित को निरंतर आश्वस्त करता है कि यह एक सामान्य प्रक्रिया है। इसके अलावा, परंपरावादी समाज में यौन विषयों पर बात करना वर्जित माना जाता है, जिसके चलते पीड़ित अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार के बारे में बताने का साहस नहीं कर पाता है। यौन उत्पीड़न का डर और शर्मिंदगी इतनी गहरी होती है कि पीड़ित अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहारों की चर्चा करने से कतराते हैं। रॉयल आयोग ने जब ऑस्ट्रेलिया में बाल शोषण की जांच की, तो पाया कि 57 प्रतिशत पीड़ितों ने पहली बार वयस्क होने पर इसका खुलासा किया। औसतन बाल यौन शोषण के पीड़ितों को किसी भी दुर्व्यवहार का खुलासा करने में 23.9 वर्ष लगे।
दुनिया भर के शोध बताते हैं कि जितनी जल्दी पीड़ित यौन शोषण का खुलासा करता है, उतनी ही जल्दी वह उसके नकारात्मक मनोवैज्ञानिक परिणाम से बच पाने में सफल होता है। परंतु यक्ष प्रश्न यह है कि यह साहस उनके भीतर उत्पन्न कैसे होगा? इसका स्पष्ट उत्तर है-परिवार के भावनात्मक संबल से, क्योंकि यहीं से सुरक्षा और संरक्षण का प्रथम अध्याय आरंभ होता है। परिवार से प्राप्त यह अभेद्य सुरक्षा बालक को ऐसी दुर्घटना का शिकार होने से न केवल बचाती है, बल्कि अगर दुर्भाग्यवश ऐसा कुछ घटित हो जाए, तो उसके विरुद्ध आवाज उठाने का साहस भी प्रदान करती है।