अत्यधिक बारिश के कारण पहाड़ों से मैदानों तक कई राज्यों में बाढ़ के चलते हालात बदतर हो गए हैं। गुजरात, राजस्थान, असम, ओडिशा और पश्चिमी बंगाल के कई हिस्सों में बाढ़ के कारण जन-जीवन अस्तव्यस्त हो गया है। अनेक नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। देश के अनेक भागों में हाई अलर्ट जारी किया गया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में कई स्थान ऐसे हैं कि जहां एक ही इलाके को बारी-बारी से सूखे और बाढ़ का सामना करना पड़ता है। विकास की विभिन्न परियोजनाओं के लिए जिस तरह से जंगलों को नष्ट किया गया और पेड़ों की कटाई की गई, उसने स्थिति को और भयावह बना दिया। इससे मानसून तो प्रभावित हुआ ही, भू-क्षरण एवं नदियों द्वारा कटाव किए जाने की प्रवृति भी बढ़ी।
बाढ़ और सूखा पुराने जमाने से ही हमारे जीवन को परेशानी में डालते रहे हैं। बाढ़ और सूखा केवल प्राकृतिक आपदाएं भर नहीं हैं, बल्कि ये एक तरह से प्रकृति की चेतावनियां भी हैं। यह विडंबना ही है कि पहले से अधिक पढ़े-लिखे समाज में प्रकृति के साथ सामन्जस्य बैठाकर जीवन जीने की समझदारी अभी विकसित नहीं हो पाई है। पिछले कुछ समय से भारत को जिस तरह से सूखे और बाढ़ का सामना करना पड़ा है, वह आईपीसीसी की जलवायु परिवर्तन पर आधारित उस रिपोर्ट का ध्यान दिलाती है, जिसमें जलवायु परिवर्तन के कारण देश को बाढ़ और सूखे जैसी आपदाएं झेलने की चेतावनी दी गई थी। आज ग्लोबल वार्मिंग जैसा शब्द इतना प्रचलित हो गया है कि इस मुद्दे पर हम एक बनी-बनाई लीक पर ही चलना चाहते हैं।
यही कारण है कि कभी हम आईपीसीसी की रिपोर्ट को संदेह की नजर से देखने लगते हैं, तो कभी ग्लोबल वार्मिंग को हौव्वा मानने लगते हैं। दरअसल जलवायु परिवर्तन का एक ही जगह पर अलग-अलग असर हो सकता है। यही कारण है कि हम बार-बार बाढ़ और सूखे का ऐसा पूर्वानुमान नहीं लगा पाते हैं, जिससे कि लोगों के जान-माल की समय रहते पर्याप्त सुरक्षा हो सके। पिछले कुछ वर्षों में कस्बों और शहरों में जो विकास और विस्तार हुआ है, उसमें पानी की समुचित निकासी की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। यही कारण है कि देश के अधिकतर कस्बों और शहरों में थोड़ी बारिश होने पर ही सड़कों पानी भर जाता है।
गौरतलब है कि 1950 में हमारे यहां लगभग ढाई करोड़ हेक्टेयर भूमि ऐसी थी, जहां पर बाढ़ आती थी, लेकिन अब लगभग सात करोड़ हेक्टेयर भूमि ऐसी है, जिस पर बाढ़ आती है। हमारे देश में केवल चार महीनों के भीतर ही लगभग अस्सी फीसद पानी गिरता है। उसका वितरण इतना असमान है कि कुछ इलाके बाढ़ और बाकी इलाके सूखा झेलने को अभिशप्त हैं। इस तरह की भौगोलिक असमानताएं हमें बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती हैं। पानी का सवाल हमारे देश की जैविक आवश्यकता से भी जुड़ा है। 2050 तक हमारे देश की आबादी लगभग एक सौ अस्सी करोड़ होगी। ऐसी स्थिति में पानी के समान वितरण की व्यवस्था किए बगैर हम विकास के किसी भी आयाम के बारे में नहीं सोच सकते हैं।
बाढ़ पर राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में बाढ़ के कारण हर साल लगभग एक हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है। यह नुकसान लगातार बढ़ता ही जा रहा है। पूरे विश्व में बाढ़ से होने वाली मौतों में पांचवां हिस्सा भारत का है। बाढ़ केवल हमारे देश में कहर नहीं ढा रही है, बल्कि चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल जैसे देश भी इसी तरह की समस्या से जूझ रहे हैं।
हमारे देश में सूखे और बाढ़ से पीड़ित लोगों के लिए अनेक घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन मात्र घोषणाओं के सहारे ही पीड़ितों का दर्द कम नहीं होता है। सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि इन घोषणाओं का लाभ वास्तव में पीड़ितों तक भी पहुंचे