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यूसीसी: नागरिक संहिता का एक आसान रास्ता और चुनाव पूर्व वर्ष का सियासी परिदृश्य

कमर वहीद नकवी
Updated Sun, 16 Jul 2023 08:02 AM IST

सार

अगर हम राजनीति को एक तरफ रख दें और भाजपा रचनात्मक रवैया अपनाते हुए एक 'आउट ऑफ द बॉक्स आइडिया' पर विचार करने को तैयार हो, तो एक आसान रास्ता यह निकल सकता है कि इसे 'ऐच्छिक' कानून के रूप में लाया जाए।
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समान नागरिक संहिता - फोटो : Amar Ujala


इसमें शक नहीं कि एक प्रगतिशील समाज के निर्माण के लिए यूसीसी बेहद जरूरी है। अगर हम राजनीति को एक तरफ रख दें और भाजपा रचनात्मक रवैया अपनाते हुए एक 'आउट ऑफ द बॉक्स आइडिया' पर विचार करने को तैयार हो, तो एक आसान रास्ता यह निकल सकता है कि इसे 'ऐच्छिक' कानून के रूप में लाया जाए। यानी जो इस कानून को अपनाना चाहे, वह इसे चुन ले और जो अपने पर्सनल लॉ या पुरानी परंपरागत व्यवस्था पर चलना चाहे, वह उसे चुन ले। प्रावधान यह हो कि जिसने भी यूसीसी का विकल्प चुन लिया, वह अपने पुराने पर्सनल लॉ आदि पर वापस नहीं लौट सकता।


पढ़कर बड़ा झटका लगा न आपको? लेकिन आगे की लाइनें पढ़िए और जरा ठंडे दिमाग से सोचिए। देश में इनकम टैक्स देनेवाले कुल चार प्रतिशत लोग हैं। सरकार इनकम टैक्स कानून के तहत छूट के कुछ प्रावधानों को खत्म करना चाहती थी, लेकिन यह भी नहीं चाहती थी कि इससे कोई नकारात्मक संदेश जाए। इसलिए उसने टैक्स का नया ढांचा तो दिया, साथ ही लोगों को यह विकल्प भी दिया कि वे छूट वाले पुराने और बिना छूट वाले नए टैक्स ढांचों में से किसी एक को चुन सकते हैं। सवाल यह है कि अगर केवल चार प्रतिशत करदाताओं के लिए एक 'ऐच्छिक' विकल्प दिया जा सकता है, तो फिर देश की समूची आबादी को प्रभावित करनेवाली नागरिक संहिता के मामले में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता?


आप कह सकते हैं कि ऐसा होने पर बहुत कम लोग ही यूसीसी को चुनेंगे? लेकिन ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है। मेरा मानना है कि ऐसा होने पर पहले साल में ही शायद 50 प्रतिशत से भी ज्यादा लोग इसे चुन लेंगे और अगले पांच से दस साल में समूची आबादी इसे स्वतः मान लेने पर मजबूर हो सकती है। कैसे? आइए, देखते हैं।


वर्ष 2017 में लोकनीति-सीएसडीएस ने एक सर्वे में पाया था कि देश में 40 फीसदी हिंदू, 24 फीसदी मुस्लिम, 38 फीसदी ईसाई और 30 फीसदी सिख यूसीसी लाए जाने के समर्थक हैं। यह संख्या अच्छी-खासी है। सर्वे यह भी बताता है कि 2004 के मुकाबले यूसीसी का समर्थन करनेवालों की संख्या 2017 आते-आते काफी बढ़ी है। तो छह साल बाद यानी 2023 तक यह संख्या और बढ़ी ही होगी, ऐसा मानना गलत नहीं होगा।


दूसरी बात, 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अकेले 37.4 फीसदी और एनडीए को करीब 45 फीसदी प्रतिशत वोट मिले थे। मोटा-मोटा मान लें कि ये 45 फीसदी वोटर यूसीसी का समर्थन करते ही होंगे। फिर यूसीसी का विरोध करने वाली पार्टियों के बहुत-से नेता, कार्यकर्ता और वोटर भी भीतर से इसके समर्थक हैं ही और इसके ऐच्छिक होने की स्थिति में वे भी इसे चुनेंगे ही। उधर, विभिन्न आदिवासी समूहों और धार्मिक समुदायों के पास विरोध की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी, क्योंकि वे अपने पुराने कानूनों पर चलने को स्वतंत्र होंगे।


लेकिन भविष्य में इसके दायरे में कैसे और लोगों को आने के लिए प्रेरित किया जाए? आसान है यह। यूसीसी विकल्प चुनने वालों को कुछ प्रोत्साहन दिया जा सकता है। जैसे, उन्हें विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं और सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जा सकती है। बैंकों से कर्ज की ब्याज दर में भी छूट दी जा सकती है, उच्च शिक्षा की प्रवेश परीक्षाओं की मेरिट लिस्ट में समान अंक पाने पर उन बच्चों को प्राथमिकता दी जा सकती है, जिनके माता-पिता में से किसी एक ने यूसीसी का विकल्प चुना हो।
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यूसीसी में एक प्रावधान यह भी किया जा सकता है कि पर्सनल लॉ या कोई अन्य परंपरागत कानून मानने वाले किसी समुदाय का कोई व्यक्ति यदि यूसीसी का विकल्प चुने, तो उससे जुड़े किसी पारिवारिक व उत्तराधिकार विवाद का निपटारा यूसीसी से ही हो, पर्सनल लॉ या अन्य परंपरागत कानून से नहीं। जाहिर है, ऐसे कई मामलों में आमतौर पर वह व्यक्ति लाभ की स्थिति में होगा, जिसने यूसीसी का विकल्प चुन रखा होगा, क्योंकि यूसीसी तमाम पर्सनल लॉ आदि के मुकाबले ज्यादा प्रगतिशील होगी। यह स्थिति देर-सबेर दूसरों को भी इसे अपनाने को मजबूर कर देगी।


सरकार आधार पोर्टल पर यूसीसी का विकल्प चुनने की सुविधा आसानी से उपलब्ध करा सकती है और इसे चुननेवालों को एक 'कलर कोडेड' आधार कार्ड दिया जा सकता है। और अंत में एक और बात, इसका नाम समान नागरिक संहिता के बजाय भारतीय नागरिक संहिता क्यों न हो? समान शब्द यहां कहीं न कहीं मन में एक अनावश्यक विभाजक रेखा खींचता है, जिससे हम बच सकते हैं।

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