भाजपा और आरएसएस
शुरुआत में जनसंघ और बाद में भाजपा ने भारत के संविधान में विश्वास रखा। यह एक लोकतांत्रिक दल के रूप में विकसित हुई और खुद को राजनीतिक स्पेक्ट्रम के दाहिने हिस्से में स्थापित किया। इसने खुद को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग दिखाने का प्रयास किया, जो मध्य से बाएं स्थान पर थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा लोकतांत्रिक दल बनी रही।
लेकिन भाजपा के वैचारिक मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सोच अलग रही है। आरएसएस का मानना है कि भारत एक भाषा, एक संस्कृति, एक राजनीतिक दल और संभव हो तो एक धर्म वाला देश होना चाहिए।
नरेंद्र मोदी, जो भाजपा के वास्तविक नेता हैं, आरएसएस की इस सोच को स्वीकार करते हैं, लेकिन साथ ही यह भी समझते हैं कि यह लक्ष्य केवल चुनाव जीतकर नहीं, बल्कि योजनाबद्ध कदमों से हासिल किया जा सकता है। 2014 के बाद सरकार द्वारा उठाए गए संवैधानिक, विधायी और प्रशासनिक कदमों को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। नागरिकता संशोधन कानून, समान नागरिक संहिता, जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम और वन नेशन वन इलेक्शन जैसे प्रयास इसी दिशा में कदम हैं।
अपेक्षा और निराशा
2014 से 2024 तक मोदी का प्रभाव चरम पर था। उन्हें भरोसा था कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को 400 से अधिक सीटें मिलेंगी, लेकिन उन्हें केवल 240 सीटें मिलीं, जो साधारण बहुमत से कम है।
2024 के बाद उनके सभी प्रयास 2029 से पहले खोई जमीन वापस पाने पर केंद्रित हैं। यदि 2026 में संविधान संशोधन विधेयक पास हो जाता, तो महिला आरक्षण के नाम पर सीटों का पुनर्निर्धारण और चुनावी सीमाओं में बदलाव किया जा सकता था। इससे दक्षिणी राज्यों का प्रभाव कम हो जाता। साथ ही, संसद में अन्य संशोधनों के जरिए वन नेशन वन इलेक्शन को लागू किया जा सकता था।
2024 तक भाजपा को लगता था कि उसके पास चुनाव जीतने का पक्का फार्मूला है-हिंदी भाषी राज्यों में मजबूत संगठन, धन बल, अनुकूल राज्यपाल, दबाव में नौकरशाही, जांच एजेंसियों का उपयोग, नियंत्रित मीडिया और सीमित न्यायिक हस्तक्षेप। पूर्ण सत्ता के रास्ते में मुख्य बाधा दक्षिणी राज्य और पश्चिम बंगाल हैं।
वन नेशन वन इलेक्शन विधेयक
मुझे आशंका है कि यदि वन नेशन वन इलेक्शन विधेयक पारित हो गया, तो विपक्ष बिखर सकता है। क्षेत्रीय दल और कांग्रेस मिलकर विपक्ष बनाते हैं। वे राज्यों में एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं, लेकिन लोकसभा में एकजुट हो सकते हैं, जैसा 2024 में हुआ। यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे, तो क्षेत्रीय दलों के लिए एकजुट होना कठिन हो जाएगा। इससे भाजपा को फायदा होगा और विपक्ष कमजोर होगा। इसलिए भाजपा इस विधेयक को अपने व्यापक लक्ष्य का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती है। 2024 के चुनाव का सबक यह है कि कई दलों के साथ आने के बावजूद भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। अगर विपक्ष ने सबक नहीं सीखा, तो छोटे दल धीरे-धीरे खत्म हो सकते हैं। अंततः लोकसभा चुनाव में दो बड़े गठबंधन बनना जरूरी है, जिससे केंद्र में सत्ता का एकाधिकार रोका जा सके, विकल्प बने रहें और भारत का धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणराज्य स्वरूप बना रहे।