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खुद को गले लगाकर तो देखें: कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं खुद-ब-खुद हल हो जाएंगी, वर्तमान की नजर से देखना सबसे अहम

क्रिस्टीना कैरन, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Sun, 20 Jul 2025 06:39 AM IST

सार

अपने बचपन के दर्दों और अधूरी ख्वाहिशों को अगर वर्तमान की नजर से देखा जाए, या कहें कि खुद को गले लगाकर देखा जाए, तो कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं खुद-ब-खुद हल हो जाएंगी।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Freepik.com


पेशेवर परामर्शदाता और इस विषय पर एक नई पुस्तक की लेखिका निकोल जॉनसन ने कहा कि मैं हमेशा लोगों से कहती हूं कि अपने भीतर के बच्चे की पुनः परवरिश करना असुविधाजनक और अजीब होता है। पुनः परवरिश (पुनर्पालन) की शुरुआत 1960 के दशक में हुई, जब चिकित्सक जैकी शिफ ने सिजोफ्रेनिया से पीड़ित अपने मरीजों को अपने साथ रहने और फिर बचपन में लौटने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने एक देखभालकर्ता की भूमिका निभाई और अपने मरीजों को गोद में उठाया। उन्हें डायपर पहनने और बोतल से दूध पीने में भी मदद की। शुरू में उनकी अपारंपरिक पद्धति की प्रशंसा हुई, लेकिन जब उनकी देखभाल में एक मरीज की मौत हो गई, तो उन्हें नैतिकता के उल्लंघन का दोषी पाया गया और उनकी पद्धति की व्यापक रूप से आलोचना की गई।


1970 के दशक में, मनोचिकित्सक म्यूरियल जेम्स ने पुनर्पालन की नई अवधारणा प्रस्तुत की। उनका मानना था कि यह एक स्व-निर्देशित प्रयास होना चाहिए, जहां चिकित्सक नहीं, बल्कि रोगी अपने भीतर के बच्चे के लिए एक प्रेमपूर्ण अभिभावक की भूमिका निभाए। पुनर्पालन का यही वह रूप है, जो आज सबसे अधिक स्वीकृत और प्रचलित है। कुछ पुनर्पालन रणनीतियों को स्वतंत्र रूप से निपटाया जा सकता है, लेकिन डॉ. बेट ने कहा कि किसी चिकित्सक से मदद लेना सबसे अच्छा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, पुनर्पालन एक तकनीक है, न कि चिकित्सा। वेल्स के लिए अपने भीतर के बच्चे की पुनः परवरिश मददगार साबित हुई है।

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