तत्कालीन राजनीति की चर्चा का मुख्य विषय तीसरा मोर्चा और उसकी संभावित सरकार हो गई है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव कह रहे हैं कि इस बार तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी। मायावती का खेमा उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए प्रयासरत है, तो नीतीश कुमार भी इस दौड़ में शामिल हैं। शीर्ष भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी कुछ महीने पहले गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी सरकार बनने जैसी संभावना जताई थी।
पर यह तीसरा मोर्चा कहां है? इसका गठन किन परिस्थितियों में किन्हें मिलाकर हो सकता है? यह चुनाव के पूर्व होगा या बाद में? इसमें निर्णायक तत्व क्या-क्या होंगे? चुनाव से पहले तो तीसरे मोर्चे के गठन की कोई संभावना नहीं दिखती। सांप्रदायिकता-विरोध मुलायम की सैद्धांतिक निष्ठा से जुड़ा प्रश्न है। वामपंथी भी कांग्रेस के खिलाफ निरंतर आंदोलनरत हैं। लेकिन वे भी फूंक-फूंककर कदम उठा रहे हैं।
लोकसभा चुनाव के बारे में कहा जा रहा है कि इस बार राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव अभियान चलाने तथा भाजपा द्वारा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने का इतना भी प्रभाव नहीं पड़ने जा रहा है कि कांग्रेस और भाजपा अपनी मौजूदा सीटें बचा पाएं। कांग्रेस अवश्य आशान्वित है कि मोदी की उम्मीदवारी से अल्पसंख्यकों का समर्थन मिलने में उन्हें आसानी होगी। लेकिन कमजोर संगठन, नेताओं के आपसी द्वंद्व और राहुल गांधी की पू्र्व कोशिशों को देखें, तो कांग्रेस की उम्मीद में दम नहीं लगता।
पर सच यह है कि आजादी के बाद से आज तक केंद्र में तीसरे मोर्चे की सरकार कभी बन ही नहीं पाई। वह सरकार कांग्रेस-विरोधियों की थी, जैसे 1967 में विभिन्न राज्यों में संविद या संयुक्त सरकारें बनी थीं। वर्ष 1967 में भाजपा भी कांग्रेस-विरोधी सरकारों में शामिल थी। उत्तर प्रदेश में चरण सिंह की सरकार में सबसे बड़ा दल जनसंघ था, हालांकि उसमें समाजवादी और कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थीं। महाराष्ट्र में भी शरद पवार इस प्रकार की संयुक्त सरकार के नेता बने थे, जिसका समर्थन भाजपा और शिवसेना, दोनों कर रही थीं। बंगाल में जनसंघ का अस्तित्व नहीं था, लेकिन वहां कांग्रेस से अलग हुए लोग भी मोर्चे का नेतृत्व कर रहे थे। यानी 1967 की राजनीति का मुख्य तत्व गैरकांग्रेसवाद ही था।
वर्ष 1977 में केंद्र में पहली बार गैरकांग्रेसी सरकार बनी थी। उसमें वाम मोर्चे को छोड़कर अधिकांश विपक्षी दलों ने मिलकर जनता पार्टी बनाया था। पर वह प्रयोग स्थायी नहीं हो पाया। वर्ष 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह वामपंथियों और भाजपा के समर्थन से प्रधानमंत्री बने। पर उसे भी तीसरा मोर्चा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसका मूल तत्व गैरकांग्रेसवाद था। चंद्रशेखर के नेतृत्व में बनी कांग्रेस द्वारा पालित सरकार चार महीने ही चली।
1994 के बाद केंद्र में एक-एक साल की दो सरकारें आईं, जिनमें एक के नेता एचडी देवगौड़ा थे और दूसरे के इंद्र कुमार गुजराल। पर ये कांग्रेस द्वारा पोषित-समर्थित सरकारें थीं। उसके बाद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी भाजपा की अगुवाई वाली राजग सरकार में चंद्रबाबू नायडू और जयललिता थीं। जयललिता के बाहर होने के बाद ममता बनर्जी और करुणानिधि ने राजग सरकार का समर्थन किया। ये दोनों कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार में भी रहे।
यानी आज तक राजनीति का मुख्य तत्व कांग्रेस-विरोध या भाजपा-विरोध ही रहा है। फिर समकालीन राजनीति में स्थानीय तत्व अधिक महत्वपूर्ण बन गए हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में माया, ममता और जयललिता को कम करके नहीं देखा जा सकता, लेकिन इनमें आपसी एकता की संभावना कम है। ऐसे में, कथित तीसरे मोर्चे का मुख्य आधार क्या होगा?
माया, मुलायम, करुणानिधि और जयललिता एक मंच पर नहीं आएंगे, फिर बीजू पटनायक या नीतीश कुमार की दिशा क्या होगी? इसलिए अधिकतम वामपंथी और मुलायम एक ओर हो सकते हैं। शरद पवार भी इस विकल्प के संबंध में सोच सकते हैं, लेकिन महाराष्ट्र के उनके राजनीतिक स्वार्थों की रक्षा कौन कर पाएगा? जाहिर है, तीसरे मोर्चे का नया राजनीतिक समीकरण इतना आसान नहीं है।