ऐसा पक्के तौर पर लग रहा था कि सिंगापुर में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आंखों में धूल झोंकी गई। ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास को निलंबित करने का एलान कर भारी रियायत दी है। शिखर बैठक अपने आपमें रियायत है और इसके अलावा उन्होंने उत्तर कोरिया को सुरक्षा की गारंटी दी और उनके समकक्ष किम जोंग उन को इस बैठक ने वैधता प्रदान कर दी, सो अलग।
ट्रंप ने किम जोंग उन के साथ जो विशेष संबंध बनने का दावा किया है, उसे उत्तर कोरिया में इस तरह से प्रस्तुत किया जाएगाः किम ने परमाणु और मिसाइल परीक्षणों के जरिये अमेरिकी राष्ट्रपति को उत्तर कोरिया को बराबर की परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता देने और उसे सुरक्षा प्रदान करने के साथ ही दक्षिण कोरिया के साथ जारी जंग को रद्द करने को मजबूर किया, जिसका प्योंगयांग दशकों से विरोध करता रहा है।
इन रियायतों के बदले लगता है कि ट्रंप बहुत कम हासिल कर पाए। संयुक्त बयान में किम ने कोरिया प्रायद्वीप को परमाणु निरस्त्रीकरण करने की सिर्फ उसी प्रतिबद्धता की तस्दीक की, जोकि उत्तर कोरिया 1992 के बाद से कई बार कर चुका है। किम से मुलाकात के बाद ट्रंप ने संवाददाता सम्मेलन में दावा किया, वह परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए तैयार हैं। ऐस लगा मानो वह जताना चाहते हैं कि उन्होंने कुछ उल्लेखनीय समझौता हासिल कर लिया है, जबकि हकीकत यह है कि जो रियायतें दी गई हैं, वह तो खुद उनकी तरफ से थीं।
संयुक्त बयान का सबसे उल्लेखनीय पहलू वह है, जोकि इसमें शामिल ही नहीं किया गया। इसमें जिक्र नहीं है कि उत्तर कोरिया अपने प्लूटोनियम और यूरेनियम कार्यक्रम रोकेगा, इसमें अंतरमहाद्वीपीय बैलास्टिक मिसाइलों को नष्ट किए जाने का जिक्र नहीं है, इसमें इस बात का जिक्र नहीं कि निरीक्षकों को परमाणु प्रतिष्ठानों के मुआयने की इजाजत दी जाएगी, इसमें जिक्र नहीं है कि उत्तर कोरिया अपने संपूर्ण परमाणु कार्यक्रम को सार्वजनिक करेगा, न तो समय सीमा का जिक्र है न ही प्रमाणन का, यहां तक कि स्पष्ट रूप से यह भी नहीं कहा गया है कि परमाणु हथियारों या लंबी दूरी की मिसाइलों का परीक्षण स्थायी तौर पर रोक दिया जाएगा।
ऐसा लगता है कि किम ने अपनी बातें तो मनवा ली और ट्रंप को कुछ हासिल नहीं हुआ और उन्हें इसका एहसास तक नहीं हुआ। अभी ट्रंप के पास पिछले वार्ताकारों की तरह दिखाने को कुछ नहीं है, जिन्होंने उत्तर कोरिया के साथ वार्ता कर 1994 के सहमति वाले ढांचे जैसा समझौता हासिल किया था, जिसमें कड़ी निगरानी के साथ उस देश के प्लूटोनियम कार्यक्रम पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया गया था।
ट्रंप ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोरियाई युद्ध में मारे गए अमेरिकी सैनिकों के अवशेष एकत्र करने की घोषणा भी की, लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। 1989 में उत्तर कोरिया की मेरी यात्रा के दौरान वहां के अधिकारियों ने अवशेष लौटाने का वायदा किया था और सच्चाई यह है कि बीते वर्षों में उत्तर कोरिया ने कुछ अवशेष लौटाए भी हैं। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि वहां और कितने अवशेष बाकी हैं।
ट्रंप ने दावा किया कि किम के साथ उनका 'उत्कृष्ट संबंध' है और दोनों नेताओं के लिए वाकई यह अच्छी बात है कि उनके बीच मिसाइलों का अदान-प्रदान नहीं, बल्कि सौहार्द हो। एक अर्थ में तो यह ट्रंप का खुद का पैदा किया तनाव था, जब उन्होंने उत्तर कोरिया को पूरी तरह से तबाह कर देने की धमकी दी थी। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या किसी नेता को उस संकट को खत्म करने का श्रेय लेना चाहिए, जो खुद उसने पैदा किया।
और भी ढेर सारी बातें हैं, जिनके बारे में हम नहीं जानते और भविष्य को लेकर अभी काफी अनिश्चितताएं हैं। लेकिन अभी स्थिति यह है कि ऐसे संकेत नहीं मिले हैं कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु हथियार त्यागने को तैयार है और ट्रंप को ईरान परमाणु समझौते जैसा कुछ दूर-दूर तक भी हासिल नहीं हुआ है, जिसके कारण ईरान को अपना 98 फीसदी संवर्धित यूरेनियम नष्ट करना पड़ा। किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के लिहाज से भी यह अजीब रहा कि उन्होंने कनाडा के प्रधानमंत्री के साथ अशिष्टता की और इसके ठीक अगले दिन दुनिया के सर्वाधिक अधिनायकवादी देश के नेता को गले लगाया। ट्रंप ने किम के बारे में कहा, 'वह बहुत प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं।
मुझे एहसास हुआ कि वह अपने देश से बहुत प्रेम करते हैं।' ट्रंप ने किम की तारीफ तो की है और यह कहते हुए कि, उस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अभ्यास 'उकसाने वाला कदम' है, आश्चर्यजनक ढंग से उत्तर कोरिया के नजरिये को इस तरह स्वीकार कर लिया मानो यह उनका अपना नजरिया हो। इसी तरह से ट्रंप ने स्वीकार किया कि उत्तर कोरिया में मानवाधिकार की स्थिति बेहद बदतर है, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि वैसे ऐसी स्थिति तो कई जगह है। (ध्यान रहे, 2014 की संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि उत्तर कोरिया में मानवाधिकारों का जैसा उल्लंघन होता है, वैसा दुनिया में कोई और उदाहरण नहीं है)
यह देखना विस्मयकारी है कि कैसे एक अमेरिकी राष्ट्रपति उत्तर कोरिया के तानाशाह के प्रवक्ता की तरह व्यवहार कर रहा है। जनवरी, 2017 में ट्रंप ने एक ट्वीट में घोषणा की, 'उत्तर कोरिया ने अभी कहा है कि वह ऐसे आणविक हथियार विकसित करने के अंतिम चरण में है, जो कि अमेरिका तक मार कर सकते हैं। ऐसा नहीं होगा!' ऐसा लगता है कि ट्रंप की निगरानी में यह हो चुका है और लगता नहीं कि सिंगापुर की शिखर बैठक के बाद स्थितियां बदलेंगी।
हमारी चाहे जो भी राजनीति हो, हम सब चाहते हैं कि ट्रंप कोरिया प्रायद्वीप में तनाव कम करने में सफल हों और यह देखना अच्छा लगा कि ट्रंप अब सैन्य विकल्प के बजाय बातचीत को तवज्जो दे रहे हैं। आगे और बातचीत होनी है और इससे संभवतः प्लूटोनियिम उत्पादन रुक जाए और मिसाइलें नष्ट कर दी जाएं। लेकिन जहां तक पहले दौर की बात है, तो ऐसा लगता है कि ट्रंप गच्चा खा गए।
©The New York Times