विश्व के शांतिप्रिय देश चाहते हैं कि युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में शांति बहाल हो। यह लड़ाई से होगा या आपसी बातचीत से, देखने की बात है। फिलहाल हिंसा थमने की उम्मीद नजर नहीं आ रही है। दूसरी तरफ सुरक्षा हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। अमेरिका को अफगानिस्तान में दाखिल हुए 16 साल हो चुके हैं। उसके इतिहास के सबसे लंबे युद्ध में तालिबान और हक्कानी नेटवर्क को खत्म करने में उसे कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली।
इसके विपरीत अब इस्लामिक स्टेट (आईएस) के कमांडरों ने तालिबान के साथ हाथ मिला लिया है और पिछले कुछ सप्ताह में जितने भी आत्मघाती हमले हुए हैं, उसके लिए तालिबान और आईएस ने जिम्मेदारी ली है। हाल ही में तालिबान और आईएस ने संयुक्त रूप से अफगानिस्तान के एक गांव में दर्जनों लोगों का नरसंहार किया है। इस हमले में इन दोनों आतंकी संगठनों के बीच एक दुर्लभ सहयोग पाया गया, जो अफगानिस्तान के सुरक्षाबलों के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। इस हमले में महिलाओं व बच्चों सहित पचास आम शहरी मारे गए। अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी और मुख्य कार्यकारी अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने इस हमले की निंदा करते हुए इसे जंगी अपराध करार दिया। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान में इस साल के पहले तीन महीनों में 1,662 लोग मारे गए, जिसमें लगभग 20 प्रतिशत की जिम्मेदारी आईएस व तालिबान ने कबूल की है।
दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभाले छह महीने से भी ज्यादा हो गए हैं, लेकिन अब तक वह अपने सलाहकारों से अफगानिस्तान में अमेरिका की रणनीति को लेकर विचार-विमर्श कर रहे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री रेक सटिलरसन का कहना है कि ट्रंप पहले जैसी स्थिति को बनाए रखने के इच्छुक नहीं है। ट्रंप की राष्ट्रीय सुरक्षा टीम अफगानिस्तान में और अधिक सैनिक भेजने या हटाने को लेकर बंटी हुई है। ट्रंप ने खुद स्वीकार किया है कि यह उनके लिए एक बड़ा निर्णय है। आम ख्याल यह है कि ट्रंप अफगानिस्तान में जमीनी लड़ाई लड़ने के लिए अब और अमेरिकी सैनिक तैनात करने के हक में नहीं हैं।
अमेरिका ने यों तो पाकिस्तान को आतंकवादियों को पनाह देने वाले देशों की सूची में डाल दिया है, लेकिन इससे कोई बड़ा नतीजा निकलने वाला नहीं। लश्कर व जैश जैसे आतंकी संगठन नाम बदलकर वहां से अपनी विध्वंसक कार्रवाई चलाते रहे हैं। तालिबान व हक्कानी नेटवर्क भी सीमा पार करके अफगानिस्तान में खून खराबा करते रहेंगे। ट्रंप के ऐसे सलाहकार भी हैं जो पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने के लिए मशवरा दे रहे हैं। लेकिन अमेरिका अपने हितों की पूर्ति के लिए अभी ऐसा नहीं करना चाहता। कई अमेरिकी सीनेटर अफगानिस्तान में भारत के साथ सहयोग बढ़ाए जाने के लिए ट्रंप पर दबाव भी बनाए हुए हैं। देखा जाए तो ट्रंप प्रशासन ने अफगानिस्तान नीति पर फैसला लेने में काफी देरी कर दी है, जिससे तालिबान और आईएस को अपनी विध्वंसक कार्रवाइयों का दायरा बढ़ाने में एक अच्छा मौका मिल गया है। अमेरिकी नीति की दशा-दिशा को लेकर काबुल चिंतित है। वहां के लोग अपने अजीजों के शव उठाते-उठाते थक गए हैं। जरूरी है कि अब बिना देरी किए अफगान नीति पर फैसला लिया जाए और उस पर तुरंत अमल हो। अमेरिका का अफगानिस्तान में काफी कुछ दांव पर लगा है। अन्यथा हक्कानी और तालिबान और मजबूत होंगे। हो सकता है, तालिबान वहां सत्ता पर फिर काबिज हो जाए, जिससे 9/11 जैसी घटना फिर घट सकती है।