हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी मोटरबाइक हर्वे डेविडसन पर पचास फीसदी आयात शुल्क घटाने की सूचना के सिलसिले में किए गए प्रधानमंत्री मोदी के टेलीफोन कॉल का जिक्र करते हुए उन्हें 'खूबसूरत' और 'शानदार' व्यक्ति बताया और अपने खास अंदाज में उनका मजाक उड़ाते हुए साफ कर दिया कि वह इससे रोमांचित नहीं हैं।
इस टिप्पणी ने भारत में लोगों को नाराज किया और कई लोगों का तो मानना है कि यह न केवल भद्दी और कूटनीति के विरुद्ध थी, बल्कि गैरजिम्मेदाराना टिप्पणी भी थी। सबसे उदार टिप्पणी विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव की आई कि 'ट्रंप बिल्कुल ट्रंप की तरह बातें कर रहे थे।'
लेकिन क्या दुनिया को ट्रंप नामक व्यक्ति से कोई लेना-देना है? नहीं। दुनिया का मतलब अमेरिकी राष्ट्रपति से है, जो अपने अतिवाद के साथ चिल्लाते हुए थकता नहीं है। दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र, प्रेस की आजादी का मक्का कहे जाने वाले और असंख्य नवाचारों की जन्मभूमि (जिसने अरबों लोगों की जीवन-शैली में बदलाव लाया) के राष्ट्रपति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसी मिसाल पेश करें, ताकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सम्मान मिले, न कि वह स्टैंडअप कॉमेडियन जैसा व्यवहार करें!
इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि अमेरिकी उत्पादों पर असीमित आयात शुल्क का मुद्दा वैध है और इस पर अनिवार्य रूप से चर्चा होनी चाहिए तथा इसे निपटाया जाना चाहिए। लेकिन क्या यह ऐसा मुद्दा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति सार्वजनिक रूप से इसे मसखरे अंदाज में उठाएं, जिसमें भारत में निर्यात होने वाली करीब 3700 हर्वे डेविडसन और भारत से अमेरिका निर्यात होने वाली 1000 मोटरबाइक का मुद्दा शामिल है। किसी भी तरह से भारत में निर्मित होने वाली मोटरबाइक की संख्या और इसमें लगी कुल राशि इतनी कम है कि इसे विदेश मंत्रालय के समक्ष नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास के डिप्टी चीफ ऑफ मिशन उठा सकते हैं!
यहां तक कि जब मई, 1998 में भारत ने परमाणु परीक्षण किया, बिल क्लिंटन ने भारत पर भारी प्रतिबंध लाद दिए थे, लेकिन उन्होंने कभी अटल बिहारी वाजपेयी का मजाक नहीं उड़ाया था। रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर, दोनों परोक्ष में इंदिरा गांधी की काफी आलोचना करते थे, लेकिन बांग्लादेश के जन्म से पूर्व भारत-अमेरिकी संबंधों में तनाव के चरम दिनों में भी उन्होंने कभी इंदिरा गांधी का मजाक नहीं उड़ाया। अफसोस, व्हाइट हाउस में ऐसा कोई नहीं है, जो अरबपति राष्ट्रपति को बता सके कि राष्ट्र प्रमुख के व्यवहार के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत कुछ मानदंड हैं। अगर किसी ने ट्रंप को उनके बयान के औचित्य के बारे में बताया होता, तो उनका सुर ऑस्ट्रेलियाई व ब्रिटिश प्रधानमंत्री, मैक्सिको के राष्ट्रपति व जर्मन चांसलर के लिए कुछ अलग होता। और वह दोस्त तथा दुश्मन के साथ एक जैसा ही बर्ताव नहीं करते।
अगर वह फिर से नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाते हैं, तो लाखों भारतीयों को नाराज करने का जोखिम मोल लेंगे। मोदी ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें अमेरिका ने दस साल तक वीजा नहीं दिया, फिर भी उन्होंने ऐतिहासिक संकोच को दूर हटाकर भारत को अमेरिका के करीब लाया। नोटबंदी और जीएसटी के कार्यान्वयन से संबंधित नकारात्मक प्रभावों के बाद भारत ने फिर से सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल कर लिया है, जो अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को व्यापक व्यावसायिक संभावनाएं प्रदान करता है।
अगर आप भारत को प्रमुख रक्षा और रणनीतिक साझीदार बताते हैं, जिसके साथ आप सालाना रणनीतिक, व्यावसायिक संवाद और व्यापक सैन्य अभ्यास करते हैं तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र, चतुर्पक्षीय सुरक्षा वार्ता, अफगानिस्तान और अन्य क्षेत्रीय व वैश्विक मुद्दों पर भारत का सहयोग चाहते हैं, तो आप करीब चार हजार हर्वे डेविडसन मोटरबाइक की खातिर अपने व्यापक रणनीतिक नजरिये को नुकसान नहीं पहुंचा सकते। यह अमेरिका के राष्ट्रीय हित में नहीं है। ऐसे मुद्दों को भारत-अमेरिकी व्यापार परिषद, वार्षिक द्विपक्षीय व्यावसायिक संवाद, राजनयिक चैनलों और अंततः विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से निपटाया जा सकता है। ट्रंप को यह समझना चाहिए कि ऐसी टिप्पणी करके वह अपने मतदाताओं को खुश कर सकते हैं, लेकिन दीर्घकालीन अर्थों में यह उनकी 'अमेरिका प्रथम' की नीति के हित में नहीं है। ट्रंप को कुछ अपरिहार्य कठिन तथ्यों को ध्यान में रखना होगा-पहला, विश्व एक ध्रुवीय नहीं है। अमेरिका अकेली महाशक्ति नहीं है, भले ही आर्थिक मामलों में उसे चीन पर मामूली बढ़त हासिल हो और उसके पास भारी सैन्य शक्ति हो। दूसरा, दुनिया का सबसे ताकतवर राष्ट्र भी एक ही समय पूरी दुनिया से झगड़ा मोल नहीं ले सकता। आपने अपने रणनीतिक नीतिपत्र में चीन और रूस को सामरिक प्रतिद्वंद्वी बताया है। आप अपने पारंपरिक सहयोगियों को भी धमकाते हैं-यूरोपीय संघ और कनाडा। इराक, लीबिया, सीरिया और अफगानिस्तान अमेरिकी नीति की विफलता के उदाहरण हैं। येरूसलम को इस्राइल की राजधानी घोषित करके आपने तुर्की समेत पूरे मुस्लिम जगत को नाराज कर दिया है। उत्तर कोरिया जैसे छोटे देश के नेता किम जोन उन से कैसे निपटें, यह आपको पता नहीं है। आप टीपीपी और पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते से बाहर निकल गए। आप अब भी मैक्सिको की सीमा पर दीवार खड़ी करना चाहते हैं और वैश्वीकरण का विरोध करते हैं। अपने नियुक्त बारह सहयोगियों को अब तक आपने खो दिया है। म्यूएलर जांच की तलवार आपके ऊपर लटकी है। जाहिर है, चीजें आपके खिलाफ हैं, लेकिन अपनी हताशा आप मोदी पर क्यों निकाल रहे हैं? बेहतर होगा कि आप चुप रहें और योग करें। भारत आपका सबसे अच्छा मित्र है, उसे अपने लापरवाह रवैये से न खोएं।