आज चीनी सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा शेयर किए जाने वाले वायरल मीम्स में से एक है—द अमेरिकन किल लाइन। वीडियो गेम की शब्दावली से लिया गया यह शब्द उस सीमा को दर्शाता है, जहां पहुंचने पर एक कमजोर किरदार को आसानी से खत्म किया जा सकता है। यह चीन में प्रचलित उस आम धारणा की ओर इशारा करता है कि लाखों अमेरिकी परिवार तबाही के कगार पर खड़े हैं—बस नौकरी जाने, बीमारी या किसी अचानक खर्च आने की देर है, और वे पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे। यह अमेरिका के लिए चीन में प्रचलित एक ऐसी उपमा बन गई है, जिसे आर्थिक पतन, हिंसक अपराध और अपरिवर्तनीय गिरावट में फंसा हुआ माना जाता है। जाहिर है, यह सही नहीं है।
अमेरिका में हिंसक अपराधों की दर दशकों में सबसे कम है; देश के पास बेजोड़ भू-राजनीतिक और वित्तीय शक्ति बरकरार है, और इसकी अर्थव्यवस्था आज भी जीवंत है। चीन की अर्थव्यवस्था से यह 50 प्रतिशत से भी अधिक बड़ी है। फिर भी, ट्रंप की चीन यात्रा के दरम्यान वहां एक खतरनाक किस्म का 'अति-आत्मविश्वास' पनपता दिख रहा है, जो अमेरिका के पतन से जुड़ी गलत धारणाओं पर आधारित है। यह ऐसी 'अड़ियल' प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है, जिसके चलते चीनी नेता अपने देश की ताकत को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने को ज्यादा तत्पर हो रहे हैं; और भविष्य में अमेरिका के साथ होने वाले किसी टकराव में उनके पीछे हटने की संभावना कम हो रही है।
इस वसंत में पूरे चीन में मुझे हर जगह यही बात सुनने को मिली। हाल ही में जब 'किल लाइन' मीम का बेहद खौफनाक रूप सामने आया और चर्चा में रहा, तो चीन में मेरे परिवार वालों ने कहा कि उन्हें अमेरिका में रहने वाले रिश्तेदारों की सुरक्षा को लेकर डर लग रहा है। पिछले एक दशक में अमेरिका के प्रति लोगों का नजरिया काफी हद तक बिगड़ गया, क्योंकि ट्रंप एक ऐसे अमेरिका की नुमाइंदगी करते नजर आते हैं, जो अस्थिर व कमजोर है। दिसंबर में हुए एक सर्वे में सामने आया कि लगभग आधे चीनी लोगों का मानना है कि दुनिया भर में अमेरिका का असर कम हो रहा है। यह धारणा कुछ हद तक एक बचाव तंत्र है, जो चीनी लोगों को अपनी समस्याओं (जैसे, सुस्त अर्थव्यवस्था, ढहता प्रॉपर्टी बाजार, उच्च बेरोजगारी और अनिश्चितता की व्यापक भावना) से निपटने में मदद करता है।
देंग शियाओपिंग के दुभाषिए के तौर पर काम करने वाले यूनिवर्सिटी प्रोफेसर झांग वेइवेइ ने जनवरी में एक वायरल वीडियो में बेतुका दावा किया कि चीन दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहां लोग अच्छा खाना खाते हैं। कम्युनिस्ट पार्टी की बयानबाजी इस बात को और मजबूत करती है। इसके लिए बस चीन के सरकारी न्यूज चैनल पर रात की खबरें देखना काफी है: आधे घंटे के इस प्रसारण का ज्यादातर हिस्सा देश की घरेलू सफलताओं का गुणगान करता है, और आखिर के कुछ मिनटों में अमेरिका की अंदरूनी गड़बड़ियों पर बात होती है, जिसमें आजकल ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़ी गई जंग से पैदा हुई वैश्विक उथल-पुथल का ही बोलबाला रहता है।
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने शिक्षा जगत से 'गलत' पश्चिमी बौद्धिक ढांचों (न्यायिक स्वतंत्रता और शक्तियों का पृथक्करण) को हटाने और उनकी जगह ऐसे विचारों को लाने पर जोर दिया है, जो देशभक्ति, पार्टी की विचारधारा और राष्ट्रीय सुरक्षा पर बल देते हैं। पहले, कई आम चीनी लोग ऐसी बातों को महज प्रोपेगेंडा मानकर अनदेखी कर देते थे। लेकिन हाल के सर्वेक्षणों और अध्ययनों से पता चलता है कि अब ज्यादा लोग (खासकर युवा चीनी) इसे धीरे-धीरे सच मानने लगे हैं। मैं 1980 के दशक में चीन में बड़ा हुआ, जब देश दुनिया के लिए खुल रहा था। हमें उम्मीद थी कि एक दिन हम फिर से महान शक्तियों की कतार में शामिल हो जाएंगे। पर एक स्पष्ट विनम्रता भी थी—मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में खुद को ढालने की एक चाहत। आज, मैं एक ऐसा चीन देखता हूं, जो हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा समृद्ध और शक्तिशाली है—आत्मविश्वासी और अपने ही नियमों के अनुसार चलने को तत्पर।
अब चीनी नेता व्यापार और टेक्नोलॉजी के मामले में अमेरिका के दबाव को ऐसा खतरा नहीं मानते, जिसके लिए उन्हें कोई समझौता करना पड़े; बल्कि वे इसे अपनी ताकत का इस्तेमाल करके आसानी से टाले जा सकने वाले दबाव के तौर पर देखते हैं। जैसा कि पिछले साल राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने किया था, जब उन्होंने 'रेयर अर्थ' और दूसरे जरूरी खनिजों का निर्यात रोकने की धमकी दी थी, जिसके चलते ट्रंप को टैरिफ के मामले में पीछे हटना पड़ा था। इस तरह का प्रभाव एक मुख्य कारण है कि चीन महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में, साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों और सोलर पैनल जैसी स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों में, और दवा निर्माण के उन कच्चे माल में (जो दुनिया की अधिकांश दवा आपूर्ति का आधार हैं) अपना वर्चस्व बनाने के लिए लगातार आक्रामक प्रयास कर रहा है। भविष्य की व्यापार वार्ताओं या किसी भू-राजनीतिक टकराव की स्थिति में, ये अब चीन के लिए 'अंतिम उपाय' का काम करेंगे। जैसे-जैसे चीनी जनता का घमंड बढ़ रहा है, वैसे-वैसे देश के नेताओं के लिए दक्षिण चीन सागर या ताइवान से जुड़े संभावित संकटों के दौरान संयम दिखाने की राजनीतिक कीमत भी बढ़ती जा रही है। पिछले साल गेम-थ्योरी पर हुई एक रिसर्च से पता चला कि राष्ट्रवाद में जरा-सी भी बढ़ोतरी होने पर, इस बात की संभावना काफी बढ़ जाती है कि किसी भी टकराव की स्थिति में चीन और अमेरिका, दोनों ही ज्यादा आक्रामक रुख अपना लेंगे।
यह रुझान ऐसा नहीं है, जिसे पलटा न जा सके। चीन के प्रति अमेरिका की नीति को फिर से दो बातों पर केंद्रित किया जाना चाहिए: एक, प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना (जैसे कि अहम आपूर्ति शृंखला में अमेरिका की मजबूती बढ़ाना और एशिया में अपनी भू-राजनीतिक मौजूदगी को सशक्त करना) और दूसरा, उन मानवीय संबंधों को फिर से बहाल करना, जिन्होंने कभी इस रिश्ते को जोड़े रखने में मदद की थी और दोनों पक्षों को अपनी-अपनी जानकारी के दायरे में सिमटने से रोका था। यह एक सरल, लेकिन संभावित रूप से प्रभावी शुरुआती कदम होगा कि वाशिंगटन चीनी छात्रों और विद्वानों के लिए वीजा और सुरक्षा संबंधी बाधाओं को कम करे, और पर्यटन, शिक्षा तथा व्यापार के क्षेत्रों में आदान-प्रदान को बढ़ावा दे।
ट्रंप ने नौ साल पहले अपने पहले कार्यकाल में चीन का दौरा किया था। यात्रा में इतना लंबा अंतराल नहीं होना चाहिए। अमेरिका का निरंतर, स्पष्ट और दृढ़ जुड़ाव ही शायद चीनी गलतफहमियों को दूर करने और दुनिया के इस सबसे महत्वपूर्ण रिश्ते को फिर से पटरी पर लाने का सबसे अच्छा तरीका हो सकता है।
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