यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि किसी भी देश की मानव संसाधन क्षमता सिर्फ प्रारंभिक शिक्षा से विकसित नहीं हो सकती। वर्तमान दौर में केवल पढ़ना-लिखना जान लेना ही पर्याप्त नहीं है। ऐसे में, अगर लाखों बच्चे पढ़ाई के बीच में स्कूल छोड़ रहे हैं, तो यह केवल शिक्षा का संकट नहीं, बल्कि देश की उत्पादकता और सामाजिक प्रगति पर भी प्रश्नचिह्न है।
दरअसल, प्राथमिक स्तर पर बच्चों को स्कूल तक लाने में मध्याह्न भोजन, मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म और छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं ने भूमिका निभाई और अभिभावकों को भी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया। लेकिन, माध्यमिक शिक्षा तक पहुंचते-पहुंचते समस्याओं का स्वरूप बदल जाता है। आर्थिक दबाव, सामाजिक बाधाएं, शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार की चिंता और पारिवारिक हालात बच्चों को स्कूल से दूर करने लगते हैं। हालांकि इसमें सबसे बड़ी समस्या आर्थिक ही है।
गरीब और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए किशोरावस्था में पहुंच चुके बच्चों की पढ़ाई जारी रखना आसान नहीं होता। खासकर लड़कों को कमाने और लड़कियों को घरेलू जिम्मेदारियों की ओर धकेल दिया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह स्थिति और गंभीर है, जहां माध्यमिक विद्यालय अक्सर दूर होते हैं और परिवहन की सुविधाएं सीमित रहती हैं। रिपोर्ट का यह कहना गंभीर है कि देश के एक लाख से भी अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जिनमें से 89 फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।
हैरानी की बात है कि देश में तकरीबन आठ हजार स्कूल ऐसे हैं, जो केवल नाम के लिए चल रहे हैं और जिनमें एक भी बच्चा नहीं पढ़ता। इसके अतिरिक्त भी, देश में हजारों स्कूल ऐसे हैं, जहां पानी, शौचालय, बिजली और प्रयोगशाला वगैरह कुछ नहीं है। यह विडंबना ही है कि एक ओर भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश बनने की ओर अग्रसर है, वहीं दूसरी तरफ, बड़ी संख्या में युवा अधूरी शिक्षा के साथ श्रम बाजार में प्रवेश कर असंगठित रोजगार का दायरा बढ़ा रहे हैं। देश ने शिक्षा के पहले चरण की लड़ाई काफी हद तक जीत ली है। अब चुनौती स्कूलों के दरवाजे खोलने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि हर बच्चा सिर्फ स्कूल पहुंचे ही नहीं, बल्कि अपनी शिक्षा पूरी भी करे।