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सच्चा मन परम तीर्थ के समान है

Wed, 17 Jul 2013 09:41 PM IST
शिवकुमार गोयल
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आदि शंकराचार्य ने धर्मशास्त्रों का गहन अध्ययन किया था। वह ज्ञान की साक्षात मूर्ति थे। बड़े-बड़े विद्वान उनकी ख्याति सुनकर उनके पास पहुंचा करते थे। हर कोई उनसे अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए लालायित रहा करता था। एक बार एक जिज्ञासु उनके पास अपनी समस्याओं को लेकर पहुंचा।
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उसने उनसे पूछा, दरिद्र कौन है? शंकराचार्य जी ने बताया, जिसकी तृष्णा असीमित है, वह दरिद्र है। उस जिज्ञासु ने दूसरा प्रश्न किया, धनी कौन है? उत्तर मिला, जो पूर्ण संतोषी है, वही धनी है। संतोष से बड़ा धन दूसरा कोई नहीं है। फिर उसने अगला सवाल किया, जीवित रहते हुए भी कौन मर चुका है? शंकराचार्य ने कहा, उद्यमहीन एवं निराश व्यक्ति जीवित होते हुए भी मृतक के समान है।

शंकराचार्य लोगों को उपदेश देते हुए अक्सर कहते थे, श्रुतिजनित आत्मज्ञान को सांसारिक बंधन कहते हैं। सच्चरित्रता सबसे महत्वपूर्ण भूषण है। सच्चा मन परम तीर्थ के समान है। कामिनी-कंचन की आसक्ति पतन का कारण बनती है। सत्संग, दान, सद्विचार और संतोष ब्रह्म प्राप्ति के सरल साधन हैं। सच्चा संत वही है, जो समस्त विषयों से वीतराग, मोहरहित और ब्रह्मनिष्ठ है।
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शंकराचार्य कहते हैं, प्राणियों का ज्वर चिंता है। विवेकहीन व्यक्ति मूर्ख है। जो ब्रह्म की प्राप्ति कराती है, वही विद्या है। जिसने मन को जीत लिया, समझो, उसने जग को जीत लिया।
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