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आंतरिक तनाव: बांग्लादेश की राह पर बलूचिस्तान, पाकिस्तानी हुकूमतों से परेशान कई प्रांत चाहते हैं आजादी

शिवदान सिंह Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Tue, 24 Sep 2024 03:58 AM IST

सार

पाकिस्तानी हुकूमतों से परेशान वहां के कई प्रांत आजादी चाहते हैं, जैसा 1970 के पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश में हुआ।
 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : एएनआई


पाकिस्तान के तानाशाहों ने वहां के बहुत से प्रदेशों के नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों का हनन करते हुए उन्हें विकास से दूर रखा। अब यह स्थिति पूर्वी पाकिस्तान की तरह ही बलूचिस्तान और सिंध में है। पूरे पाकिस्तान में सेना के समर्थन से वहां का पंजाबी समाज हर जगह छाया हुआ है। 1970 में शेख मुजीबुर्रहमान को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ था, परंतु पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह प्रधानमंत्री के रूप में केवल पश्चिमी पाकिस्तान के पंजाबी सूबे के किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे, जिसके कारण शेख मुजीबुर्रहमान को प्रधानमंत्री पद नहीं दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप पूरे पूर्वी पाकिस्तान में अशांति और विद्रोह शुरू हो गया और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। बांग्लादेश के निर्माण के बाद से ही बलूचिस्तान में भी स्वतंत्रता की मांग जोर से उठाई जाने लगी।


1947 में आजादी के समय ही बलूचिस्तान पाकिस्तान में जाने के बजाय स्वतंत्र राष्ट्र बने रहना चाहता था। इसके लिए ब्रिटिश अदालत में खुद मोहम्मद अली जिन्ना ने उसका पक्ष रखा था, लेकिन आजादी के बाद जिन्ना अपने वादे से पलट गए और बल प्रयोग से बलूचिस्तान का 1948 में पाकिस्तान में विलय कर लिया। पाकिस्तान के पूरे क्षेत्रफल का 40 फीसदी हिस्सा बलूचिस्तान में है और वहां के अधिकतर खनिज संसाधन और प्राकृतिक गैस इसी प्रांत में पाई जाती है। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान का प्रमुख ग्वादर बंदरगाह भी बलूचिस्तान में है, जिसे चीन ने काराकोरम राजमार्ग से जोड़ दिया है। चीन के साझा आर्थिक गलियारा (सीपेक) की ज्यादातर आर्थिक योजनाएं भी इसी प्रांत में हैं। 1947 से पहले बलूचिस्तान में कबीलाई सरदारों का नियंत्रण था, जो संकेतात्मक रूप में आज भी वहां कायम है, लेकिन अब बलूचिस्तान में शिक्षा के प्रसार के बाद वहां एक पेशेवर वर्ग उभरा है, जो बलूचिस्तान के विरुद्ध पंजाबियों के वर्चस्व वाले पाकिस्तान के सौतेले और सामंती व्यवहार के कारण हिंसक और अहिंसक, दोनों तरीकों से बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की मांग उठा रहा है।


वर्ष 2006 से पहले बुगती कबीले के सरदार नवाब अकबर खान बुगती पाकिस्तान में राष्ट्रीय स्तर के राजनेता थे, जो बलूचिस्तान में की गई नाइन्साफियों के विरुद्ध आवाज उठाते थे। लेकिन 2006 में तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ के निर्देश पर पाकिस्तानी सेना ने उनकी हत्या कर दी। उनकी बर्बरतापूर्ण हत्या के बाद से बलूचिस्तान में विद्रोह और तेजी से उभरा और उसके बाद बांग्लादेश की मुक्तिवाहिनी की तरह वहां बलूचिस्तान लिबरेशन सेना नाम के संगठन का गठन हुआ। यह संगठन बलूचिस्तान में बाहर से आकर बसने वाले पंजाबियों और सिंधियों पर हमले के साथ-साथ पाकिस्तानी सेना तथा चीनी संस्थानों में काम करने वाले चीनियों पर हमले कर रहा है। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य है बलूचिस्तान की पहचान की सुरक्षा और पाकिस्तान के आधिपत्य से आजादी।


वहीं, पख्तुनख्वा प्रांत में लंबे समय से तहरीके तालिबान पाकिस्तान पाकिस्तानी सेना पर हमले कर रहा है, जिसमें ज्यादातर पख्तून हैं, जिनके घर बलूचिस्तान में हैं। बलूचिस्तान की उपेक्षा के कारण शुरू हुए विद्रोह को समझकर उसका समाधान करने के बजाय पाकिस्तान की सरकार भारत के कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा दे रही है। अभी जम्मू-कश्मीर में हो रहे विधानसभा चुनाव को देखते हुए यहां पर पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी हमले बढ़ गए हैं। इस बार पाकिस्तान विश्व को यह दिखाना चाहता है कि कश्मीर घाटी के साथ-साथ जम्मू क्षेत्र के निवासी भी भारत से अलग होना चाहते हैं। भारत में आतंकवादी गतिविधियां जारी रखने के बावजूद पाकिस्तान की सरकार दिखावे के लिए रिश्तों को सामान्य करने के लिए आपसी बातचीत के प्रस्ताव रख रही है, जिसका खंडन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कड़े शब्दों करते हुए कहा कि जब तक पाकिस्तान आतंकी गतिविधियों को बंद नहीं करेगा, तब तक उसके साथ कोई बातचीत नहीं होगी।

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