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अभी परेशानी, आगे सुकून

Mon, 14 Nov 2016 06:35 PM IST
जी श्रीदत्तन
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जी श्रीदत्तन
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जब मैंने एक फल विक्रेता से नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पांच सौ और हजार रुपये के नोटों को कानूनी रूप से अमान्य किए जाने के फैसले के बारे में पूछा, तो उसने मुस्कराते हुए जवाब दिया-मोदी जी ने पूरे देश को हिला दिया। अब अमीर और गरीब बराबर हो गए। हालांकि वह इस बात को लेकर दुखी था कि सरकार के इस कदम ने उसके व्यवसाय को प्रभावित किया है, लेकिन उसे यकीन है कि यह कदम व्यापक स्तर पर व्यवस्था साफ करेगा।
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मीडिया में वैसे ग्राहकों की परेशानियों की खबरें भरी पड़ी हैं, जिन्हें अपने पुराने नोट बदलने या बैंक खातों में जमा करने के लिए घंटों लाइन में इंतजार करना पड़ रहा है। कुछ जगहों पर एटीएम के आगे कुछ किलोमीटर तक लंबी लाइनें देखी गईं। उनमें से कुछ लोग उदास और सरकार से नाराज हैं, जबकि अधिकतर लोग इस बात को लेकर खुश हैं कि सरकार ने ऐसा साहसिक कदम उठाया है।

ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन पर इसका गंभीर असर पड़ रहा है, क्योंकि वहां बहुत ज्यादा एटीएम और बैंकों की शाखाएं नहीं हैं। हालांकि उनमें से कइयों ने जन-धन खाते खुलवाए हैं, लेकिन ज्यादातर लोग अपनी छोटी बचत अपने घरों में रखते हैं। बैंक जाना उनके लिए एक बोझिल प्रक्रिया है, क्योंकि इससे उनकी एक दिन की मजदूरी का नुकसान होता है।
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इसी तरह छोटे-छोटे व्यापारियों, किराना दुकानदारों और छोटे विक्रेताओं के लिए नकदी के अभाव में अपने उत्पाद बेचना मुश्किल हो रहा है। शहरी क्षेत्रों में जिन मध्यवर्गीय लोगों के पास क्रेडिट कार्ड और डिजिटल भुगतान की व्यवस्था है, उनकी समस्याएं इतनी गंभीर नहीं हो सकती हैं। लेकिन चूंकि भारत अब भी मुख्य रूप से नकदी पर चलने वाली अर्थव्यवस्था है, इसलिए आम आदमी असुविधा झेलने के लिए बाध्य है।

इसलिए प्रधानमंत्री ने पहले ही चेताया था कि इससे असुविधा हो सकती है और देश से भ्रष्टाचार मिटाने के अभियान को सफल बनाने के लिए लोगों के सहयोग की जरूरत है। यह समझने योग्य बात है। इतने विशाल पैमाने पर लागू किया गया कोई भी उपाय, चाहे उसे कितना भी बेहतर ढंग से क्यों न अमल में लाया जाए, काफी लोगों के लिए मुश्किलों का कारण बनता है। सरकारें हमेशा लोगों के व्यापक हित को ध्यान में रखकर फैसले लेती हैं। उदाहरण के लिए, केरल में पहली कम्युनिस्ट सरकार द्वारा भूमि सुधार कानून लागू किया गया था, जिसे देश का सबसे महत्वपूर्ण (परिवर्तनकामी) गेमचेंजर बताया गया। इस योजना के चलते रातोंरात कई जमींदार कंगाल हो गए और कई गरीब बड़ी संपत्ति के मालिक बन बैठे। लेकिन शायद ही कभी हमने उन लोगों की दुर्दशा पर चर्चा की, जिन्होंने अपनी संपत्ति गंवा दी या जिन्हें असुविधा झेलनी पड़ी। इसी तरह अमौद्रीकरण से सरकार ने प्रचलित 85 फीसदी करेंसी नोट को अमान्य घोषित कर दिया है। यह काला धन के खिलाफ एक बड़ा उपाय है, जिससे भारी अराजकता फैली और भ्रम की स्थिति पैदा हुई। सरकार को आम आदमी की पीड़ा को कम करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने चाहिए।

लेकिन सवाल यह भी है कि सरकार का यह कदम क्या पीड़ा झेलने के लायक है। क्या इससे लोगों को फायदा होगा? कई देशों ने बड़ी मात्रा में अपनी मुद्राओं के अमौद्रीकरण की कोशिश की है। इन देशों में सरकार के ऐसे कदमों का नकदी से प्यार करने वाले लोगों ने विरोध किया। भारत जैसे देश में जहां भ्रष्टाचार काफी ज्यादा है, इस कदम से निश्चित रूप से भ्रष्टाचार कम होगा। लेकिन इस कदम के बाद भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए और भी कड़े प्रयास करने होंगे।

मोदी सरकार के इस कदम के आलोचक कहते हैं कि भ्रष्टाचार खत्म करने के ऐसे प्रयास पहले भी किए गए थे, जो अपना प्रभाव छोड़ने में विफल रहे। लेकिन 1977 में ऐसा प्रयास क्यों विफल रहा? उस समय मात्र आठ फीसदी आबादी ही बैंकिंग सुविधा के दायरे में थी। इसके अलावा बाद की सरकारों ने भी ऐसे उपायों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता नहीं दिखाई। लेकिन प्रधानमंत्री जन-धन योजना के सफल क्रियान्वयन के बाद 20 करोड़ अतिरिक्त लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा गया है। सरकार ने लोगों को वैध तरीके से कमाए अपने धन का खुलासा करने का मौका भी दिया और उसका अच्छा नतीजा निकला। उससे बहुत सारा धन बैंकिंग व्यवस्था के दायरे में आया। जन-धन योजना के तहत सभी खाताधारकों को डेबिट कार्ड दिया गया है।

अर्थशास्त्री रिचर्ड थैलर नकदी विहीन अर्थव्यवस्था की वकालत करते हैं, क्योंकि उनका कहना है कि यह निष्पक्ष और सुरक्षित है। केंद्र सरकार भी नकद विहीन अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना चाहती है। इससे सरकार को लेन-देन पर नजर रखने, भ्रष्टाचार कम करने और कर-संग्रहण बढ़ाने में मदद मिलेगी। कर संग्रह में वृद्धि से विकास गतिविधियों को आगे बढ़ाया जा सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि केंद्र से जब एक रुपया भेजा जाता है, तो लक्षित व्यक्ति तक उसमें से मात्र 15 पैसा पहुंचता है। इसका असर सभी विकास परियजनाओं और सरकारी योजनाओं पर पड़ेगा। इसलिए यदि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगता है, तो निश्चित रूप से इसका बड़ा फायदा गरीबों को मिलेगा।

बड़े नोटों को चलन से हटाने से अपहरण, मानव तस्करी, आतंकवाद, उगाही जैसे कई आपराधिक और अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाया जा सकता है। अमौद्रीकरण से रियल एस्टेट, फिल्म निर्माण जैसे क्षेत्रों पर विपरीत असर पड़ेगा। आने वाले दिनों में इसका पता चलेगा कि अर्थव्यवस्था पर इसका कितना असर पड़ता है।

लेकिन ग्रामीण लोगों के जीवन पर इसका बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ने वाला। एनएसएसओ के मुताबिक, प्रति व्यक्ति औसत मासिक उपभोक्ता खर्च ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र 1,429.96 रुपये है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 2,629.65 रुपये है। इसलिए बड़ी मुद्राओं के अमौद्रीकरण से उन पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा, लेकिन भ्रष्टाचार में कमी आने से उनका जीवन स्तर जरूर सुधरेगा।
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