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प्रगतिशील है तीन तलाक पर फैसला

Tue, 29 Aug 2017 08:21 PM IST
भूपेन्द्र यादव
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भूपेन्द्र यादव
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तीन तलाक पर आए फैसले को किसी संस्था या धार्मिक परंपरा विशेष के खिलाफ न मानकर एक प्रगतिशील कदम के रूप में देखना चाहिए, जो समाज के साधारण एवं वंचित वर्ग के प्रति निष्पक्ष न्याय व्यवस्था का फैसला है। इस पर मीडिया में बहस और चर्चा हुई है, जिसमें धार्मिक सांविधानिक विशेषज्ञों के साथ साधारण जन और पीड़ित पक्षों ने भी हिस्सा लिया। यह लोकतांत्रिक और सामाजिक न्याय की ओर बढ़ते भारत का आशावादी रूप है। शायरा बानो और आफरीन रहमान जैसी महिलाओं ने अपने साथ हुई नाइंसाफी के खिलाफ सांविधानिक ढांचे में संघर्ष किया और धर्म के नाम पर प्रचलित अन्यायपूर्ण प्रथा को अवैध घोषित करवाया।
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आज हम विज्ञान और तकनीक की दृष्टि से बहुत विकसित हो गए हैं, परंतु इसके समानांतर विचार की दृष्टि से भी आगे बढ़ना आवश्यक है। जो विचार मात्र किसी विशेष देशकाल में कुछ व्यावहारिक आधारों पर स्वीकारे गए, उनमें दोष की गुंजाइश रहती है, इसे प्रबुद्व भारत को पहचानना होगा। विवाह हिंदू धर्म में भी संस्कार माना गया है, परंतु प्रबुद्व समाज सुधारकों ने बाल-विवाह, सती प्रथा एवं हिंदू स्त्री के कठोर वैधव्य को अन्यायपूर्ण एवं क्रूर माना और ऐसी कुप्रथाओं के खिलाफ स्त्रियों को सांविधानिक संरक्षण मिला। इसी क्रम में तीन तलाक को असांविधानिक घोषित किया गया, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लघंन है। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को धर्म पालन की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, परंतु उसकी समानता के अधिकार को समाप्त करने का अधिकार किसी संस्था को नहीं देता है। यही कारण है कि आजाद भारत में शिक्षा, भोजन, स्वास्थ्य, राजनीतिक सहभागिता के प्रति चेतना बढ़ी है और महिलाओं तथा वंचित वर्ग में भी अपने इस हक के प्रति जागृति आई है। आज महिला सशक्तिकरण महज नारा नहीं है।

शायरा बानो और आफरीन रहमान जैसी महिलाओं ने तीन तलाक के खिलाफ जंग छेड़ी, तो यह सिर्फ घिसे-पीटे रिवाज के खिलाफ ही नहीं थी, बल्कि महिलाओं की इंसानी हक के दावे की भी लड़ाई थी। ध्यान देने वाली बात यह है कि तीन तलाक के खिलाफ आंदोलन की अगुआ मुस्लिम समाज की संभ्रांत और शिक्षित महिलाएं नहीं थीं, बल्कि सामान्य महिलाएं थीं।
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हमारी न्यायपालिका ने ऐसे प्रगतिशील फैसले महिलाओं के हक में दिए हैं, जिसने पितृसत्तात्मक ग्रंथि से संचालित समाज पर ही सवालिया निशान लगा दिया है, जो स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में ऐसी इच्छाओं का पालन करने से भी रोकता है, जो संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक का मूलाधिकार है। न्यायपालिका के फैसलों ने दिखाया है कि संयम व अनुशासन की पालना सिर्फ स्त्री के लिए नियम नहीं है, बल्कि पुरूष के आवेशात्मक और उच्छृंखल व्यवहार नितांत अनुचित हैं, इन्हें न तो उसका हक माना जा सकता है, न ही स्वाभाविक प्रवृति या मूल स्वभाव कहकर छोड़ा जा सकता है।

इस फैसले और इससे पहले तथा बाद के घटनाक्रम से हम यह सीख सकते हैं कि अकेला व्यक्ति भी संस्थागत अन्याय के खिलाफ खड़ा हो सकता है और उसे परिणाम जरूर मिलता है। यह उदाहरण है, नए भारत का और नए भारतीय का, जिसके प्रेरणास्रोत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हैं।
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-लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं
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