फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गुप्तचर एजेंसियों की पारदर्शिता

Wed, 24 Feb 2016 08:28 PM IST
सुभाष गाताडे
विज्ञापन
विज्ञापन
अपनी चर्चित पुस्तक गुप्तचर एजेंसियों की पारदर्शिता में प्रो. लारी नाथन कहते हैं कि जनतांत्रिक मुल्कों को एक अलग किस्म के विरोधाभास का सामना करना पड़ता है। राज्य की सुरक्षा के लिए स्थापित उपकरण कभी-कभी नागरिकों की सुरक्षा तथा जनतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर कर सकते हैं। वह पूछते हैं कि इस विरोधाभास को कैसे हल किया जा सकता है?
विज्ञापन


पिछले दिनों देश का सर्वोच्च न्यायालय इस विरोधाभास को एक तरह से हल करता दिखा, जब उसने उस जनहित याचिका को खारिज किया, जिसके तहत रॉ अर्थात रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग, इंटेलिजेंस ब्यूरो और नेशनल टेक्निकल रिसर्च आर्गेनाइजेशन को सीएजी के प्रति जवाबदेह बनाने की मांग की गई थी। न्यायालय का कहना था कि इससे देश की सुरक्षा व्यवस्था में खोट आ सकती है।

जनहित याचिका में इन्हें संसद की निगरानी के दायरे में लाने तथा उनके ऑडिट करने को लेकर जो तर्क पेश किए गए थे, उसमें स्पष्ट किया गया था कि ये गुप्तचर एजेंसियां नागरिकों की निजता में दखल देती है। गोपनीय सूचनाएं संग्रहीत करने की प्रक्रिया में ये किसी का भी टेलीफोन टैप कर सकती हैं। अगर किसी नागरिक की निजता के उल्लंघन की इस गतिविधि पर वैधानिक या संसदीय देखरेख नहीं रहेगी, तो क्या यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं होगा, जो जीवन के अधिकार के साथ निजता का अधिकार भी प्रदान करता है। यही नहीं, गुप्तचर एजेंसियों पर अगर अंकुश नहीं रहा, तो ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी उल्लंघन कर सकती हैं। इसमें अमेरिका एवं ब्रिटेन का उदाहरण भी पेश किया गया था, जहां पर ऐसी एजेंसियों पर संसद की निगरानी रहती है।
विज्ञापन

 
सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, मगर अब जैसी स्थितियां हैं, उसके मददेनजर यही कहा जा सकता है कि अब इसे लेकर सिविल सोसाइटी के बड़े हिस्से में भी बहस खड़ी हो रही है। याद करें, बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी द्वारा सीबीआई के स्वर्ण जयंती समारोह के मौके पर दिया गया व्याख्यान, जिसमें उन्होंने सीबीआई के कामकाज में पारदर्शिता लाने या जनता को भागीदार बनाने की पैरवी करते हुए कहा था कि किस तरह देश की सर्वोच्च गुप्तचर सेवा 'अपारदर्शिता का वस्त्र पहने हुए है, उसके पास गोपनीयता के आभूषण हैं और वह रहस्य का परफ्यूम भी लगाए हुए है।’ इसी तरह कुछ समय पहले उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने रॉ द्वारा आयोजित आर एन काव स्मृति व्याख्यान में कहा था कि गुप्तचर एजेंसियों के संचालन में अधिक निगरानी एवं जवाबदेही की आवश्यकता है। गौरतलब है कि लगभग पांच साल पहले देश की अग्रणी गुप्तचर सेवा 'नेशनल टेक्निकल रिसर्च आर्गेनाइजेशन (एनटीआरओ), जो आतंकी हमलों को रोकने के लिए तकनीकी सहायता प्रदान करती है, के संबंध में उच्च अदालत के आदेश में भी यह प्रश्न मौजूं हो उठा था कि गोपनीयता की सिथति में सत्ता के दुरुपयोग को किस तरह रोका जा सकता है?

यह सिलसिला शुरू हुआ, एनटीआरओ में कार्यरत रहे वैज्ञानिक वी के मित्तल की जनहित याचिका के बाद, जिसमें उन्होंने एनटीआरओ के चंद भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। अदालत में दायर उस याचिका का नतीजा यही निकला था कि उपरोक्त गुप्तचर एजेंसी को अपने आंतरिक ऑडिट को संसदीय समिति के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया था।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें