राजधानी दिल्ली के संसद मार्ग पर किसानों की जो रैली हुई, वह इस अर्थ में नई थी कि उसमें 184 किसान संगठनों ने शिरकत की थी। यह नया था कि जैसी टूट राजनीति के मंच पर है, वैसी ही टूट किसानों के मंच पर भी है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि हमारे सारे जन आंदोलन आपस में भी और एक-दूसरे के साथ भी इस कदर टूटे हुए हैं कि न आवाज एक हो पाती है, न निशाना। टूट की यह त्रासदी उन सबको भीतर-भीतर एक किए देती है, जिनसे लड़ने का खम भरते हैं ये आंदोलन।
देश में आज किसान दुखी है, क्योंकि हर तरह से, हर तरफ से उसे दुखी करने की कोशिशें जारी हैं। हर किसी के पास किसानों के नाम पर बहाने के लिए आंसू हैं, पर कोई अपनी आंखों का कोर भी भिगोना नहीं चाहता है। ऐसी त्रासदी के बीच असंगठित किसानों का एकजुट होना और राजधानी पहुंच कर दस्तक देना आशा जगाए या न जगाए, ध्यान तो खींचता ही है। यह देखना भी हैरान कर रहा था कि रैली में महिलाओं की संख्या खासी थी और वे वहां किसान महिलाओं के रूप में आई थीं। किसान महिलाओं की संसद वहीं संसद मार्ग पर बैठी थी और उस संसद की अध्यक्ष मेधा पाटकर बार-बार भर आता अपना गला और बार-बार उमड़ आती अपनी आंखें बचाती-छिपाती हमें एहसास कराना चाह रही थीं कि ये बहनें नहीं हैं, किसान महिलाएं हैं, जो लड़ाई की सिपाही हैं।
हमारा राजनीतिक प्रशिक्षण इस तरह हुआ है कि हम किसान को भी एक वर्ग मानकर, उसे उसके लाभ के सवाल पर संगठित कर लड़ाई में उतारना चाहते हैं। किसानों को लुभाने-भरमाने के लिए भाजपा ने कहा कि वह स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करेगी और फसल लागत की दोगुनी कीमत देगी। यह सीधा सौदा था, जिसकी व्यवहारिकता पर किसी ने विचार नहीं किया और भाजपा की झोली वोटों से भर गई। तब भी ये ही नेता थे और ये ही किसान संगठन थे। भाजपा से पिटने के बाद किसान नेताओं ने उन जुमलों को ही नारा बना लिया और कर्जमाफी, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें तथा लाभकारी मूल्य की मांग खड़ी कर किसानों को अपने झंडे के नीचे जमा करने लगे। एक तरह की राजनीतिक होड़ शुरू हुई, जिसमें किसान कम, किसान नेता ज्यादा हावी हो गए। राजस्थान के कोटा की एक सभा में पूछा एक किसान ने कि भाईजी, किस किसान की बात आप करते हो? किसान हैं कहां यहां? यहां मैं हूं, जो भाजपा का किसान हूं; आप कांग्रेस के किसान हैं और वह बसपा का किसान है! किसान कहीं हो या आप खोज लो, तो बात आगे चले।
यह खेतिहर सभ्यता का देश है। इसका औद्योगिक विकास भी खेतिहर सभ्यता को केंद्र में रखकर ही किया जा सकता है। खेतिहर सभ्यता मतलब मात्र किसान नहीं, पूरा खेतिहर समाज। परिवर्तन का यह आंदोलन खेतिहर परिवार के नेतृत्व में चलेगा, तभी परिणामकारी होगा। तब यह लड़ाई कर्जमाफी की नहीं, बल्कि खेती-किसानी कर्ज के बिना कैसे हो, इसकी खोज की होगी और ऐसी व्यवस्था बनाने की होगी, जिसमें किसान को भाव मांगने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि उसे उसके जीवनयापन की सारी सुविधा और सारे अवसर समाज द्वारा सुनिश्चित होंगे। किसान अपनी जमीन से उखड़ा और औद्योगिक इकाइयों की छाया में जीने वाला मजदूर नहीं है, जैसा कि व्यवस्था उसे बनाना चाहती है। वह जमीन से जीवन रचने वाला स्थायी समाज है। वही खेतिहर सभ्यता का आधार है। हम राजा को याचक बनाने की गलती कर रहे हैं, जो विफल भी होगी और सत्वहीन भी बनाएगी।