इस समय पूरी दुनिया के विदेश व्यापार विशेषज्ञ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नए आर्थिक सुधारों और नई आर्थिक योजनाओं के ऐतिहासिक दस्तावेज का गंभीरता से अध्ययन कर रहे हैं, जिसे हाल ही में जारी किया गया है। इस दस्तावेज में ऐसे आर्थिक और व्यापारिक सुधार हैं, जिनसे एहसास हो रहा है कि चीन दुनिया को नई व्यापारिक चुनौतियां देने के लिए दृढ़ संकल्पित है। ऐसे में भारत के लिए चीन के साथ व्यापार संतुलन की चिंताएं बढ़ गई हैं।
इसी महीने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने शी जिनपिंग के शीर्ष नेतृत्व में 18वीं केंद्रीय समिति की पूर्ण बैठक के दौरान नई आर्थिक योजनाओं का विस्तृत ब्योरा जारी किया है। इसमें ऐसे सुधार हैं, जो पहले देखने को नहीं मिले। स्पष्ट दिख रहा है कि चीन लंबी अवधि के विकास और नई व्यापार संभावनाओं को लेकर आगे बढ़ने के लिए दृढ़ संकल्पित है। नए दस्तावेज में मुक्त बाजार की पेशकदमी, श्रमिकों के शिविर हटाने, जमीन के इस्तेमाल की अवधि में सुधार, सरकारी उद्यम, कराधान, प्रवासी कामगारों के अधिकार, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान, ढांचागत अर्थव्यवस्था और आर्थिक प्रशासनिक सुधार के संबंध में अभूतपूर्व प्रावधान हैं। सबसे बड़ा संकेत है, निजी क्षेत्र और बाजार के लिए समर्थन।
दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि संसाधनों के आवंटन में बाजार को निर्णायक भूमिका दी जाएगी। सभी स्तरों पर कीमतों अथवा प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन में सरकार का हस्तक्षेप कम किया जाएगा। नए दस्तावेज का इरादा विभिन्न बाजार-विरोधी विसंगतियों को दूर करते हुए आक्रामक रूप से निर्यात बढ़ाना भी है।
ऐसे में भारत के लिए चीन के साथ व्यापार असंतुलन की चिंताएं और बढ़ गई हैं। भारत-चीन व्यापार के नवीनतम आंकड़े बता रहे हैं कि मौजूदा वित्त वर्ष में भारत से चीन को निर्यात में कमी आई है, जबकि आयात तेजी से बढ़े हैं। पिछले वर्ष भी चीन को कुल 13.53 अरब डॉलर का निर्यात हुआ, जबकि आयात 52.24 अरब डॉलर का हुआ। व्यापार घाटा लगभग 39 अरब डॉलर का रहा। जबकि वर्ष 2011-12 में व्यापार घाटा 37 अरब डॉलर का था। एक ओर चीन भारत का चौथा सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है, वहीं उसके साथ तेजी से बढ़ता व्यापार घाटा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। स्थिति यह है कि देश के हर बाजार में चीनी उत्पादों का ढेर लग गया है।
चीन तो भारत में आयात बढ़ाता गया, लेकिन भारत चीन को उतनी तेजी से निर्यात नहीं बढ़ा पाया। गौरतलब है कि भारत-चीन व्यापार में भारी उछाल वर्ष 2000 से आया। छह जुलाई, 2006 से दोनों देशों ने नाथुला दर्रे से होकर सीमावर्ती व्यापार बहाल करने के ऐतिहासिक समझौते को कार्यान्वित किया है। नई दिल्ली ने व्यापार असंतुलन का मुद्दा बीजिंग के सामने उठाया है, लेकिन भारत से निर्यात बढ़ाने के लिए चीन तत्काल कोई प्रत्यक्ष पहल करने के लिए तैयार नहीं हुआ है। भारत-चीन के बीच जिस सहमति पत्र पर दस्तखत हुए, उसमें कई भारतीय उत्पादों के निर्यात के लिए अपने दरवाजे खोलने पर सहमति दी गई है।
लेकिन वस्तुतः चीन द्वारा कदम-कदम पर मुश्किलें पैदा की जा रही हैं। भारत दो वर्ष पहले तक चीन को बड़ी मात्रा में समुद्री उत्पादों का निर्यात करता था, लेकिन चीन से कुछ प्रतिबंध के कारण इसमें काफी गिरावट आई है। चीन में दवाओं के निर्यात में भारत को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। पेट्रोलियम उत्पाद, अयस्क, खनिज, प्लास्टिक डाई और अन्य उत्पादों के निर्यात के लिए चीन में कर और बाजार संबंधी मुद्दे हैं। खाद्य तेल का व्यापार चीन में प्रतिबंधित है।
हमें चीन के साथ व्यापार असंतुलन कम करने के लिए रणनीतिक प्रयास करने होंगे। हमें चीन से बहुतायत से आने वाली कई अनावश्यक वस्तुओं के आयात पर रोक लगानी होगी। इसी तरह कई इलेक्ट्रॉनिक सामान व अन्य चीजों के आयात पर पहले शुल्क लगाया जाना चाहिए, फिर उसमें बढ़ोतरी करनी चाहिए। हमें उन चीनी उत्पादों के आयात को नियंत्रित करने की भी जरूरत है, जो मलयेशिया के रास्ते से आते हैं। चीन की तरह भारत को भी गुड गवर्नेंस की स्थिति बनानी होगी। इस तरह की कोशिशों से ही हम चीन के साथ व्यापार असंतुलन कम कर सकेंगे।