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तंबाकू मुक्त दुनिया की ओर

Fri, 20 Sep 2013 08:08 PM IST
सुभाष गाताडे
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आर्थिक एवं व्यावसायिक हित क्या जनता के स्वास्थ्य के मसलों पर हावी होते हैं? तंबाकू की खपत एवं उपलब्धता पर नियंत्रण पाने की विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुहिम के संदर्भ में यह बात नए सिरे से उजागर हुई है। दरअसल विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रमुख सुश्री मार्गरेट चान ने पिछले दिनों एक अहम खुलासा कर चौंका दिया, जब उन्होंने बताया कि महिलाओं एवं युवाओं पर फोकस करने की तंबाकू उद्योग की रणनीति के खिलाफ यूरोपीय संघ के एक प्रस्तावित कदम को अंदर से कमजोर करने में एक विश्वविख्यात तंबाकू कंपनी (फिलिप्स मॉरिस) लगी है। गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य असेंबली द्वारा 2025 तक तंबाकू के उपयोग में 30 फीसदी कमी लाने का लक्ष्य रखने के बाद तंबाकू नियंत्रण पर वैश्विक विमर्श ‘टोबैको एंडगामे’ अर्थात तंबाकू के साथ अंतिम लड़ाई की अवधारणा के इर्द-गिर्द सिमटता दिख रहा है, जिसके अंतर्गत तंबाकू की उपलब्धता एवं उपयोग को न्यूनतम स्तर पर लाने की कोशिश होगी।
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अगर हम मार्गरेट चान के वक्तव्य की ओर लौटें, तो मालूम पड़ता है कि यूरोपीय संघ का यह विधेयक ‘टोबैको प्रोडक्ट्स डाइरेक्टिव’ (टीपीडी) अगर लागू होता है, तो तमाम तंबाकू उत्पादों पर बड़े-बड़े चित्रों में स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी प्रकाशित करना अनिवार्य होगा। मगर चूंकि तंबाकू की खपत कम होने से इस धंधे में लगी कंपनियों को घाटा हो सकता है, लिहाजा विधेयक को रोकने की कोशिशों में बड़ी-बड़ी फर्में लगी हैं। इसके लिए सबसे आसान तरीका यह अपनाया गया कि विधेयक पर वोटिंग टाल दी जाए, ताकि यूरोपीय संघ का अध्यक्ष पद, जो फिलवक्त लिथुआनिया के पास है, जनवरी में यूनान के प्रतिनिधि के पास जाए और सिलसिला नए सिरे से शुरू हो।

उल्लेखनीय है कि लिथुआनिया जहां तंबाकू पर नियंत्रण का हिमायती है, वहीं यूनान इसका सख्त विरोधी है। जानकारों के मुताबिक, जल्द ही फिलिप्स मॉरिस अपना एक विशाल सेंटर यूनान में खोलने जा रहा है। पिछले दिनों लंदन से प्रकाशित अखबार गार्जियन ने चंद दस्तावेजों के अंश प्रकाशित कर बताया है कि किस तरह फिलिप मॉरिस ने मतदान टालने के लिए अरबों डॉलर खर्च किए।
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बीसवीं सदी में तंबाकू के सेवन से दस करोड़ लोगों की मौत हुई। पिछले साल मौतों की संख्या साठ लाख थी, जो 2025 से 2030 के दरम्यान अस्सी लाख सालाना हो जाएगी। इस खतरे से निपटने के लिए 2003 में फ्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑफ टोबैको कंट्रोल अपनाया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन की पहल पर सार्वजनिक स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए अपनाया गया यह पहला समझौता था, जिसमें तंबाकू की खपत कम करने के लिए कई उपाय प्रस्तावित किए गए थे। 177 मुल्कों ने इस समझौते को स्वीकारा है, लेकिन अमेरिका, अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, स्विट्जरलैंड जैसे देश इस पर सहमत नहीं हैं।

अपने देश में 27.5 करोड़ लोग तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं और इससे जनित बीमारियों के चलते दस लाख लोग सालाना मरते हैं। सरकार, नागरिक समाज और न्यायपालिका की कोशिशों के चलते देश में तंबाकू के प्रत्यक्ष विज्ञापन पर पाबंदी लगी तो है, लेकिन अपना खपत बढ़ाने के लिए आमादा तंबाकू उद्योग सरोगेट विज्ञापनबाजी का सहारा लेता है। मसलन, चूंकि शराब के विज्ञापन पर पाबंदी है, तो शराब कंपनियां उसी अंदाज में अपने मिनरल वॉटर या अन्य किसी पेयजल का प्रचार करती है। अपने यहां तंबाकू की खपत कम करने के लिए करों का इस्तेमाल भी न्यूनतम है। मसलन, बीड़ी उद्योग टैक्स के दायरे के बाहर है।

तंबाकू पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाता है, क्योंकि इसके पत्तों को इस्तेमाल लायक बनाने के लिए लकड़ियां जलानी पड़ती हैं, जिसके लिए पेड़ कटते हैं। पैकेजिंग के लिए कागज के इस्तेमाल से भी पर्यावरण को नुकसान होता है। तंबाकू अन्य फसलों की तुलना में पानी एवं जमीन के अन्य पोषक पदार्थ जल्दी सोखता है। गरीब लोग तंबाकू का अधिक सेवन करते हैं और अधिकाधिक गरीबी में धकेले जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि 2030 तक आते-आते तंबाकू जनित बीमारियों से होनेवाली मौतों का अस्सी प्रतिशत गरीब एवं मध्यम आय वाले देशों में होगा। जाहिर है कि तंबाकू की समाप्ति का लक्ष्य लेकर ही इंसानियत को आगे बढ़ना होगा।
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