केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (सीजीएसटी), एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (आईजीएसटी) एवं मुआवजा विधेयक पारित कर हम स्वतंत्र भारत के सबसे महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष कर सुधार के आखिरी चरण में पहुंच चुके हैं। व्यापक विचार-विमर्श और सहमति बनाने के कारण यह संभव हो पाया। इसके लिए प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और सभी राज्य सरकारों के मंत्रियों के प्रयासों को स्वीकार किया जाना चाहिए, जिन्होंने राष्ट्रहित में मिल-जुलकर इस सुधार को हकीकत बनाया। सरकार ने जीएसटी के व्यापक विचार से आगे जाकर काम किया और इस सुधार के प्रति सावधान राज्यों की वास्तविक समस्याओं और चिंताओं का मुआवजा आदि के जरिये निराकरण किया।
यदि संसद के कई सत्रों में जीएसटी को राजनीतिक फुटबॉल नहीं बनाया जाता, तो यह जल्दी संभव हो सकता था और अरबों डॉलर बचा सकता था। मेरे मित्र डेरेक ओ ब्रायन (तृणमूल कांग्रेस) ने संसद में व्यवधान की बात की, लेकिन मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि घोटालों से देश के लाखों करोड़ रुपये बचाने के लिए संसद में व्यवधान अलग बात है और व्यवधान पैदा करके जीएसटी को रोकना और अर्थव्यवस्था को लाखों करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाना अलग बात है। जीएसटी में देरी से हमें अकेले एक वित्तीय वर्ष में 1.3 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है।
मेरे लिए यह गौरव का क्षण था कि मैंने इस सुधार में योगदान किया और जीएसटी के लिए बनाई गई संसदीय चयन समिति में काम किया। संविधान संशोधन विधेयक (122वां संशोधन), 2014 पर अपने भाषण के दौरान मैंने कहा था कि अप्रत्यक्ष कर हर भारतीय को प्रभावित करता है। प्रत्यक्ष कर के कम दायरे को देखते हुए अप्रत्यक्ष कर हमारे आर्थिक मॉडल की रीढ़ की हड्डी है। कम कर-जीडीपी के अनुपात और कम प्रत्यक्ष कर दायरे के मद्देनजर अप्रत्यक्ष कर बेहद महत्वपूर्ण है और उसमें सुधार करके उसे सरल बनाना उपभोक्ताओं, नागरिकों और व्यवसायियों के जीवन को आसान बनाने के लिए बहुत अहम है।
जीएसटी के कारण अब 14 से 16 प्रकार के अलग-अलग करों का पालन और भुगतान का डरावना काम अब सिर्फ राज्य जीएसटी और केंद्रीय जीएसटी में सिमटकर रह जाएगा। जीएसटी सुधार का यह प्रभाव सभी व्यवसायियों और उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ी बात है, खासकर छोटे व्यवसायों के लिए, जिन्हें जटिल व अक्सर भ्रष्टाचार ग्रस्त अंतर-राज्यीय व्यापार के कारण खर्च और अनुपालन के मामले में हतोत्साहित होना पड़ता है। अनुपालन की लागत में यह कमी छोटी बात नहीं है, इससे न सिर्फ लागत घटेगी, बल्कि सभी व्यवसायियों को व्यवसाय करने में सुगमता होगी। एक भारतीय बाजार का निर्माण हमारी अर्थव्यवस्था में बेहतर प्रतिस्पर्धता और दक्षता पैदा करेगा और देश भर के उपभोक्ताओं को इससे फायदा होगा। विभिन्न करों में कमी करके यह उपभोक्ता और उत्पादक, दोनों की लागत भी घटाएगा। आसान अनुपालन के चलते कर आधार में भी विस्तार होगा। और यदि कर आधार में बढ़ोतरी होगी, तो सरकार को कल्याण कार्यों एवं सामाजिक जरूरतों के लिए खर्च करने के लिए ज्यादा राजस्व मिलेंगे। ये सभी अंततः हमारी अर्थव्यवस्था को एक ऐसी स्थिति में परिणत करेंगे, जो ज्यादा कुशल और प्रतिस्पर्धी है। जीएसटी उपभोक्ता और व्यवसाय, दोनों के लिए हितैषी है, क्योंकि यह ज्यादातर तकनीक में निवेशित है। जीएसटी नेटवर्क में स्वीकृति और फाइलिंग के लिए भी एक मंच होगा, जो कर प्रशासन का एक नया दृष्टिकोण है।
जीएसटी का संपूर्ण औचित्य इसके उपभोक्ता और छोटे व्यवस्या समर्थक होने पर निर्भर है। जीएसटी के लिए पांच विस्तृत स्लैब हैं-छूट वाली श्रेणी के लिए शून्य, पांच, 12, 18 और 28 फीसदी। इसके अलावा राज्यों को संभावित मुआवजा देने के लिए उपकर भी होगा, जो कुछ निश्चित सामान (तंबाकू और उससे संबंधित उत्पाद, गैसयुक्त पेय पदार्थ और लग्जरी कारों) पर लगाया जाएगा। लेकिन वित्त मंत्री से मैं आग्रह करना चाहूंगा कि 28 फीसदी स्लैब वाली वस्तुओं पर एक बार फिर से विचार करें और उन वस्तुओं को उस सूची से निकाल दें, जो वेतनभोगी और निर्धन वर्ग को प्रभावित करते हैं। मुझे यकीन है कि बहुत जल्दी ही, जैसे ही जीएसटी का अनुपालन बढ़ेगा, जीएसटी की कम कर दरों का दबाव बनेगा। इस देश में प्रत्यक्ष करों का तरीका इस तरह होना चाहिए-व्यापक आधार और बेहतर अनुपालन के साथ सस्ती दरें।
वर्तमान जीएसटी की कथित खामियों के बारे में सावधानी बरती जाएगी-खासकर कई स्लैब दरों और छूटों को लक्ष्य करके। मैं मानता हूं कि मौजूदा जीएसटी पूरी तरह से सही नहीं है, लेकिन जरूरी नहीं कि पूर्णता आम सहमति के अनुरूप हो। हर कर सुधार और वास्तव में आर्थिक सुधार एक विचार या कानून का विकास रहा है। जैसे ही जीएसटी व्यवस्था जड़ पकड़ेगी और उसका विस्तार करेगी, विकास और सुधार की प्रक्रिया भी शुरू होगी। आज जो अकल्पनीय है, हम उसके बारे में भी सोच सकते हैं कि भविष्य में जब राज्य जीएसटी के प्रति आश्वस्त हो जाएंगे, तो मौजूदा दोहरी कर संरचना (एसजीएसटी और सीजीएसटी) को मिलाकर भविष्य में एकल कर में उसे सुव्यवस्थित किया जा सकता है।
एक जुलाई की समय-सीमा की दिशा में आगे बढ़ते हुए जीएसटी नेटवर्क और कर प्रशासन ढांचे के लिए प्रौद्योगिकी की तैयारी महत्वपूर्ण है। नई जीएसटी और इसके अनुपालन संबंधी जरूरतों के लिहाज से इसकी हिमायत और तैयारी संबंधी कार्य करने का भी सवाल है। सरकार का उद्देश्य वर्तमान कर व्यवस्था से जीएसटी में संक्रमण को सरल और सुव्यवस्थित तरीके से अंजाम देना होना चाहिए। जीएसटी बदलते भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके कार्यान्वयन के अगले कुछ महीने इसकी सफलता को निर्धारित करेंगे और यह ऐतिहासिक अप्रत्यक्ष कर सुधार हमारी अर्थव्यवस्था की प्रगति और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।