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जुबान तो फिसल ही जाती है

Tue, 09 Dec 2014 07:22 PM IST
वीना सिंह
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अरे भाई! समझने की कोशिश तो करिए। कभी-कभी न चाहते हुए भी जुबान कुछ का कुछ कह जाती है। बाद में मुई पछताती भी बहुत है। मगर फिर क्या हो सकता है; जुबान से निकली बात पवन गति से दूसरी जुबानों तक पलक झपकते ही पहुंच जाती है। और बात का बतंगड़ बन जाता है। इस जुबान की तो महिमा ही निराली है। न जाने कितनी लड़ाइयों-बुराइयों की जड़ है यह।
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अगला-पिछला सब देख लीजिए, इसने नुकसान ही किया है। यदि राजा दशरथ की जुबान ने दो वरदान की बात न कही होती, तो श्रीरामचंद्र जी चौदह वर्ष के वनवास से बच जाते। यदि द्रोपदी की जुबान दुर्योधन को अंधा न कहती, तो महाभारत जैसा महायुद्ध न होता। यदि जुबान शांत रहती, तो सास-बहू में तू-तू मैं-मैं न होती, और टीवी पर सास बहू के सीरियल भी हिट न होते। यदि पति-पत्नी के बीच झगड़े के समय यह जुबान धैर्य से काम ले, तो तलाक होने से बच जाए। अब नेतागणों की जुबान को ही लीजिए। यदि वह इतने मनमोहक लुभावने वायदे न कर पाती, तो जनता को अपनी गिरफ्त में कभी न ले पाती। कहते हैं कि जनता सब जानती है, पर जनता इन नेताओं की मीठी जुबान के पीछे छिपी कड़ुवाहट को बिल्कुल नहीं जानती। तभी तो बार-बार छली जाती है।

यदि जुबान इतनी विशेषताओं भरी न होती, तो इस पर इतनी कहावतें न लिखी जातीं। जुबान संभाल कर बात करो, इसकी जुबान ही काली है, वह जुबान की मीठी है, वह जुबान का धनी है, सब जुबान की चाल है जैसे-जैसे मुहावरे अस्तित्व में ही न आ पाते। अब एक जुबान और इतने काम! आखिर कहां-कहां संभाले? कहीं न कहीं चूक हो ही जाती है। तो फिर यदि साध्वी जी की जुबान फिसल गई और कुछ उल्टा-पुल्टा बोल गई, तो इतनी हाय-तौबा मचाने की क्या जरूरत। अरे भई उसी जुबान से उन्होंने माफी भी तो मांग ली। अब और ढेर सारी जुबानों को चाहिए कि उस एक जुबान को माफ कर दें। क्षमाप्रार्थिनी जुबान पर थोड़ी दया तो करनी ही चाहिए। कहा भी गया है- न च धर्मो दयासमः।
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