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Lok Sabha Elections: अधिनायकवादी शासन प्रजातंत्र के लिए खतरनाक, सोच-समझकर वोट करना जरूरी

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 21 Apr 2024 05:39 AM IST

सार

यदि नरेंद्र मोदी और भाजपा तीसरी बार सत्ता में आते हैं, तो मुस्लिमों को कलंकित करने का अभियान  संभवतः और तेज हो जाएगा। प्रचंड बहुमत के साथ एक और जीत मोदी और उनकी पार्टी को मीडिया पर शिकंजा कसने, सिविल सेवकों, न्यायपालिका और सार्वजनिक विनियामक संस्थानों की स्वतंत्रता को  कमजोर करने, केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम को हिंदुत्व प्रचार का केंद्र बनाने और भारतीय संघवाद के ढांचे को कमजोर करने के लिए प्रेरित करेगी।
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मतदान - फोटो : अमर उजाला (फाइल)


हमारे इतिहास का दूसरा महत्वपूर्ण आम चुनाव मार्च, 1977 में हुआ था। जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जून, 1975 में आपातकाल लगा दिया था, तो कई लोगों ने यह मान लिया कि इससे खुली, प्रतिस्पर्धी राजनीति का अंत हो गया है। भारत भी उन असंख्य एशियाई और अफ्रीकी देशों में शामिल हो गया है, जो अधिनायकवादी शासन के अधीन आ गए थे। इंदिरा गांधी के शासन को कोई चुनौती या खतरा नहीं था, उन्हें आपातकाल हटाने और नए सिरे से चुनाव कराने की कोई मजबूरी नहीं थी। फिर भी उन्होंने ऐसा किया। इतिहासकारों ने 1977 के उन चुनावों के तीन पहलुओं पर प्रकाश डाला है, जो उन्हें विशेष रूप से उल्लेखनीय बनाते हैं। पहला तो यह कि उन्हें आयोजित किया गया था। दूसरा यह कि उनके नतीजों ने सर्वेक्षणकर्ताओं को भ्रमित कर दिया, क्योंकि आम तौर पर उम्मीद थी कि इंदिरा गांधी जीतेंगी। माना जाता था कि 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ जीत की आभा अब भी उनके आसपास मंडरा रही थी। इसके अलावा, उनकी पार्टी की स्थिति अच्छी थी। दूसरी तरफ, विपक्ष बिखरा हुआ था। विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल में समय बिताना पड़ा था। फिर भी, कांग्रेस बहुमत से काफी पीछे रह गई और श्रीमती गांधी अपनी सीट भी नहीं जीत सकीं।


इसका मतलब था कि स्वतंत्र भारत में पहली बार कांग्रेस के अलावा कोई दूसरी पार्टी सत्ता में आएगी और यह कि भारत अब एक दलीय देश नहीं रहेगा। 1977 के चुनाव की इन विशेषताओं में यह भी जोड़ा जाना चाहिए कि लंबे समय तक प्रभुत्व रखने वाली कांग्रेस पार्टी विभिन्न पार्टियों के गठबंधन, जो एक ही चुनाव चिह्न पर लड़ रहे थे, से हार गई थी। कथित जनता पार्टी में व्यापक रूप से अलग-अलग उत्पत्ति और विश्वास वाले चार दल शामिल थे, जो निरंकुशता को हराने और लोकतंत्र को बहाल करने के उद्देश्य से एकजुट हुए थे। 1977 से 2014 के बीच कोई भी एक पार्टी या गठबंधन केंद्र में दो बार से अधिक सत्ता में नहीं रहा। सत्ता का यह परिवर्तन भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा था। एक ही पार्टी के दीर्घकालिक प्रभुत्व के डर से मुक्त उन वर्षों में प्रेस, सिविल सेवाएं और न्यायपालिका अधिक स्वतंत्र और मुखर थीं। एक प्रतिस्पर्धी राजनीति भारतीय संघवाद के लिए अच्छी थी, जिसमें राज्यों को अपने आर्थिक और सामाजिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की छूट थी। क्या मौजूदा चुनाव इस प्रवृत्ति को उलट देंगे? अधिकांश सर्वेक्षणकर्ता ऐसा ही सोचते हैं। उनका मानना है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा को लगातार तीसरी बार बहुमत मिलना लगभग तय है। फिर क्या होगा?


एक टिप्पणीकार परकला प्रभाकर को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है कि यदि मोदी और भाजपा तीसरी बार जीतते हैं, तो ‘देश में और कोई चुनाव नहीं होगा।’ यह सच है कि इंदिरा गांधी की तरह मोदी में सत्तावादी प्रवृत्ति और पूर्ण प्रभुत्व की इच्छा है। हालांकि, एक महत्वपूर्ण अंतर है। 1977 में कांग्रेस सिर्फ एक राज्य (तमिलनाडु) को छोड़कर सभी में सत्ता में थी, जबकि 2024 में भाजपा पूरे दक्षिण भारत में सत्ता से बाहर है और पूर्वी तथा उत्तरी भारत के कई  राज्यों में भी। लोकतांत्रिक विपक्ष को पूरी तरह चुप कराना, मोदी और भाजपा के लिए ज्यादा कठिन होगा, भले ही वे 370 सीटें जीतने में कामयाब रहें।


तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना आदि में अब भी विपक्षी सरकारें होंगी। मोदी और शाह उनके साथ क्या करेंगे? क्या अनुच्छेद 356 लागू करेंगे या विधायकों को खरीद लेंगे? कोई भी उपाय लालच देने वाला होगा और उनके अनैतिक तरीकों के अनुरूप होगा, फिर भी उन राज्यों के लाखों नागरिकों द्वारा हर उपाय का कड़ाई से विरोध होगा, जो भाजपा को वोट नहीं देते हैं। चूंकि भाजपा का आधिपत्य देश के एक बड़े हिस्से में नहीं है, इसलिए आपातकाल की तरह भारत के पूर्णतः अधिनायकवाद की तरफ लौटने की आशंका नहीं है। इसलिए चिंतित होने की जरूरत नहीं है, लेकिन लापरवाह भी नहीं होना चाहिए। क्योंकि भाजपा अपने साथ हिंदुत्व और विभाजनकारी विचारधारा लाती है। मोदी शासन के 10 वर्षों में अल्पसंख्यकों को राजनीति के हाशिये पर धकेल दिया गया है। उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। भाजपा के सांसद और मंत्री उनका मजाक उड़ाते हैं। छात्रों को अपने गैर हिंदू साथियों के प्रति शत्रुता की भावना सिखाने के लिए पाठ्यपुस्तकों को फिर से लिखा जाता है।


यदि नरेंद्र मोदी और भाजपा तीसरी बार सत्ता में आते हैं, तो मुस्लिमों को कलंकित करने का अभियान  संभवतः और तेज हो जाएगा। प्रचंड बहुमत के साथ एक और जीत मोदी और उनकी पार्टी को मीडिया पर शिकंजा कसने, सिविल सेवकों, न्यायपालिका और सार्वजनिक विनियामक संस्थानों की स्वतंत्रता को  कमजोर करने, केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम को हिंदुत्व प्रचार का केंद्र बनाने और भारतीय संघवाद के ढांचे को कमजोर करने के लिए प्रेरित करेगी। आबादी के अनुसार, लोकसभा सीटों का पुनर्गठन इस प्रकार किया जाएगा कि उत्तर भारत का जनसांख्यिकीय लाभ (जहां भाजपा मजबूत है) दक्षिण की स्थायी राजनीतिक अधीनता में बदल जाएगा, जहां भाजपा कमजोर है।


हालांकि ऐसी संभावना नहीं है कि दक्षिण उनके दमन के आगे झुक जाएगा, लेकिन मोदी और भाजपा इसकी परवाह किए बिना अपनी योजनाओं पर आगे बढ़ सकते हैं। भाजपा को लगातार तीसरी बार बहुमत लोकतंत्र की गिरावट को और तेज कर देगा, जिसके हमारे सामाजिक ताने-बाने, आर्थिक संभावनाओं और अजन्मे भारतीयों की पीढ़ियों के भविष्य के लिए हानिकारक परिणाम होंगे। 1970 के दशक में इंदिरा गांधी ने अधिनायकवाद को पारिवारिक शासन के प्रति समर्पण से जोड़ दिया था, अब नरेंद्र मोदी अधिनायकवाद को हिंदू बहुसंख्यकवाद के प्रति समर्पण से जोड़ रहे हैं। बेशक परिवारवाद बुरा है, लेकिन बहुसंख्यकवाद तो उससे भी बुरा है, जैसा कि हमारे पड़ोसी देशों की स्थिति से पता चलता है। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि हिंदू बहुसंख्यकवाद का नतीजा उससे कोई अलग होगा। अधिनायकवाद आत्मा को कुचल देता है, जबकि बहुसंख्यकवाद मन और हृदय में जहर घोलता है। इससे पैदा होने वाली नफरत और कट्टरता राजनीति में कैंसर की तरह फैलती है, जो व्यक्तियों और समाज से सभ्यता, शालीनता, करुणा और मानवता को छीन लेती है। इसीलिए इसके उत्थान को ऐसे लोकतांत्रिक तरीकों से रोका जाना चाहिए, जो अब भी हमारे पास उपलब्ध हैं। इसीलिए 1977 के बाद यह सबसे महत्वपूर्ण आम चुनाव है।

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