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अमीरी की टमाटर रेखा

Sun, 17 Aug 2014 05:34 PM IST
अमिताभ श्रीवास्तव
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परम आदरणीय नेताजी को टमाटर कौम की तरफ से आभार। हालांकि चिट्ठी लिखने का प्रसंग पुराना हो चुका है, पर लिखने का कारण तो बनता है। गरीबी की क्या धांसू डेफिनिशन आपने पिछले दिनों दे मारी थी। टमाटर तो गरीब खाता ही नहीं, उसे तो लाल गालधारी आदमी खाता है। तभी से हम अपने सिर पर लगे हरे डंठल को ताज मानकर टहल रहे हैं। गरीबी रेखा की परिभाषा देने के लिए पगड़ी वाले पुराने पीएम अंकल ने दो बार कोशिश की थी, पर फाइनली फेल होकर वह कट लिए। दुनिया को यह दिव्य ज्ञान आपसे जो प्राप्त करना था!
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सत्ता में कुछ बात तो है। पास आते ही दिमाग की सठियाई ट्यूबलाइट पावर हाउस हो जाती है। पुरानी सरकार में एक मंत्री अंकल ने बताया था कि पांच रुपये में एक टाइम खाने का जुगाड़ हो सकता है। यह ज्ञान देते समय इससे तीन गुना ज्यादा दाम के बोतल से वह पानी गटक गए थे। फिर ‘पावर’ साहब ने बताया, चीनी का दाम बढ़ गया, अच्छा हुआ, डाइबिटीज नहीं होगा। क्या गजब का आइडिया था-सड़कें तोड़ दो, एक्सीडेंट नहीं होंगे, बिजली दो ही नहीं, पावर कट की प्रॉब्लम नहीं होगी।

एक बार चुनाव के समय प्याज के दाम बढ़े थे। आप जैसे लोगों ने कह दिया-प्याज सस्ते कर लोगों को अधर्म की तरफ उकसाएंगे क्या? आखिर प्याज वैसा ही रहा, सरकार नहीं रही। खैर आपने हमारा भाव बढ़ाया है, तो एक प्रस्ताव हम टमाटर बिरादरी भी आपको दे रही हैं। सरकार गरीबी हटाने की स्कीमें लागू करने के लिए परेशान है। आप हर स्कीम हटाकर एक ही स्कीम लागू क्यों नहीं करते? हर गरीब को एक टमाटर-डेली/वीकली।
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लेकिन कुछ सवाल फंसेंगे। जैसे, अगर आपने हम टमाटरों को संपन्न तबके से जोड़ दिया, तो हंसिया-कुल्हाड़ी वाले कम्युनिस्ट अंकल लाल सलाम ठोकने तक को तरस जाएंगे। बेचारे इस बार बिल्कुल खाली हैं। दूसरे, इन्कम टैक्स रिटर्न में एक नया कॉलम जोड़ना पड़ेगा-टोटल एनुअल टोमैटो कंजप्शन। और सबसे बड़ी बात यह कि जब पब्लिक नेताओं को टमाटर मारेगी, तो उसे क्या समझा जाएगा?
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