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दो-तिहाई आबादी की मजबूरी

Wed, 03 Apr 2013 12:11 AM IST
विनोद अग्निहोत्री
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एक तरफ तो आर्थिक उदारवाद की आंधी में विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएं कुलांचे भर रही हैं और भारत में अगले दो दशक में वैश्विक महाशक्ति बनने के सपने देखे जा रहे हैं, मगर दूसरी ओर दक्षिण एशिया में एक अरब से ज्यादा लोगों के पास शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा तक मौजूद नहीं है। 70 करोड़ से ज्यादा लोग खुले में शौच को मजबूर हैं।
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यह विद्रूप ही है कि भारत में शौचालय सुविधा प्राप्त लोगों से ज्यादा संख्या उन लोगों की है, जिनके पास मोबाइल हैं। दक्षिण एशिया के देशों में बेहतर शौचालय सुविधा के मामले में भारत पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान से भी पीछे है।

हाल ही में काठमांडू में दक्षिण एशियाई देशों के तमाम जनसंगठनों के प्रतिनिधियों के एक सम्मेलन में स्वच्छता और शौच के बुनियादी अधिकार का एक नागरिक घोषणापत्र जारी कर सभी दक्षेस देशों की सरकारों से मांग की गई है कि वे लोगों को स्वच्छता और शौच की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के अपने वायदे को पूरा करें। इसके साथ ही स्वच्छता एवं शौचालय के अधिकार को बुनियादी अधिकार का दर्जा दिया जाए।
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सिटीजंस चार्टर ऑन राइट टू सैनिटेशन के नाम से जारी इस नागरिक घोषणापत्र को सम्मेलन में शामिल 80 से ज्यादा गैर सरकारी संगठनों ने अपना समर्थन दिया।

बेहतर शौचालय सुविधा को सभी सार्क देशों में बुनियादी नागरिक अधिकार बनाने के लिए चलाए जाने वाले अभियान के लिए गठित क्षेत्रीय अभियान समन्वय दल के संयोजक और वॉटर ऐड, पाकिस्तान के मुस्तफा तालपुर के मुताबिक, यह एक गंभीर मानवीय समस्या है, जिसका हल सभी देशों को प्राथमिकता के आधार पर करना होगा।

सम्मेलन में इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई कि 2012 की विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कुल आबादी का 66 फीसदी हिस्सा शौच की स्वच्छ और बेहतर सुविधा से वंचित है, जबकि नेपाल में यह तादाद 69 प्रतिशत, अफगानिस्तान में 63 प्रतिशत, भूटान में 56 फीसदी, पाकिस्तान में 52 फीसदी, और बांग्लादेश में 44 फीसदी है। श्रीलंका और मालदीव में स्थिति कमोबेश बेहतर है। वहां की सरकारों ने इस दिशा में ध्यान देकर अपने नागरिकों के इस नैसर्गिक मानवीय अधिकार की गारंटी दी है।

पिछले एक दशक में भारत ने तेजी से आर्थिक विकास करते हुए सात-आठ फीसदी तक की विकास दर पाने में कामयाबी हासिल की, मगर मानवीय विकास में वह अब भी 134वें स्थान पर है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर 46.9 फीसदी लोगों को शौच की बेहतर सुविधा उपलब्ध है, जबकि ग्रामीण भारत में यह सुविधा सिर्फ 30.7 फीसदी जनता को ही मुहैया है।

ग्रामीण क्षेत्र के दलितों में सिर्फ 23 फीसदी और आदिवासियों में मात्र 16 फीसदी लोगों को यह सुविधा उपलब्ध है। भारत के राज्यों में इस मामले में सबसे खराब हालत झारखंड की है, जहां 77 फीसदी लोगों के पास गृह शौचालय सुविधा नहीं है। इसके बाद ओडिशा और बिहार का नंबर है, जहां क्रमशः 76.6 और 75.8 फीसदी लोग इस बुनियादी सुविधा से महरूम हैं।

शौचालय की बुनियादी सुविधाओं का यह अभाव जहां देश के सामाजिक विकास और जनस्वास्थ्य के लिए अभिशाप है, वहीं आर्थिक विकास में भी यह बाधा है। विश्व बैंक के जल और स्वच्छता कार्यक्रम के अध्ययन के मुताबिक, अस्वच्छता और शौच सुविधाओं के अभाव की वजह से चिकित्सा पर होने वाले खर्च, उत्पादकता में गिरावट और पर्यटन से होने वाली आमदनी में कमी से प्रतिवर्ष भारत को 53.8 अरब अमेरिका डॉलर का नुकसान होता है। इसकी वजह से देश में रोजाना करीब एक हजार बच्चे डायरिया जैसे रोगों से मरते हैं।

सवाल है कि क्या भारत में राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों के लिए यह मुद्दा प्राथमिक मुद्दा बन सकेगा। दिल्ली में बेघर लोगों के लिए काम कर रहे इंदु भूषण सिंह के मुताबिक, यह तभी मुमकिन है, जब भूख, गरीबी, शोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, पंचायत राज, न्यूनतम मजदूरी, मानवाधिकारों आदि के लिए अलग-अलग काम करने वाले विभिन्न संगठन एकजुट होकर समग्रता से सारे मुद्दे उठाएं। काठमांडू में इस पर भी सहमति बनी है।
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