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घर बचाने की लड़ाई में

Tue, 19 Nov 2013 05:29 PM IST
तवलीन सिंह
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यह जानते हुए भी कि अपना भारत महान ऐसा देश है, जहां इंसानों और इंसानियत की कदर कम होती है, हैरान हुई पिछले सप्ताह जब बुलडोजर चले कैंपा कोला बिल्डिंग के दरवाजों पर। हैरान हुई अधिकारियों और पुलिस वालों की बेरहमी को देखकर, और शायद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी हैरान हुए होंगे, वरना न रुकवाते लोगों को बेघर करने की यह बर्बर कार्रवाई।
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ऐसे महानगर में जहां घर मिलना इतना मुश्किल है कि झुग्गी बस्तियों में बसने को मजबूर हैं इस शहर के आधे लोग। इन बस्तियों में चोरी करके लेनी पड़ती है बिजली, सफाई की कोई सुविधा नहीं है महानगरपालिका की तरफ से और बच्चे मरते हैं गंदा पानी पीने के कारण। इन बस्तियों में रहना भी सस्ता नहीं है। एक झोपड़ी का मासिक किराया तीन हजार रुपये से ज्यादा होता है, सो ऐसे कई नागरिक हैं इस महानगर में, जो उम्र गुजारते हैं फुटपाथ पर। इनसे अगर कोई पूछने की तकलीफ करे कि इनका सबसे बड़ा सपना क्या है, तो अक्सर जवाब मिलता है एक शब्द में, घर।

मजे की बात तो यह है कि मुंबई में आवास गरीबों के लिए इतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी मध्यवर्ग के लोगों के लिए है। गरीब तो मजबूरी में कहीं भी रह लेते हैं और मुंबई के धनवान तो 27 मंजिला महल बना लेते हैं, मुकेश अंबानी की तरह, लेकिन इन दोनों के बीच में पिसता है बुरी तरह मध्यवर्गीय मुंबईवासी। इस शहर के अंदरूनी इलाकों में एक 'खोली' का मासिक किराया पैंतीस हजार रुपये से कम नहीं है। जिसकी इच्छा है अपना फ्लैट खरीदने की, उनको अपना पेट काटकर जुटाने होते हैं करीब एक करोड़ रुपये। ऐसा ही किया था कैंपा कोला में फ्लैट खरीदने वालों ने तीस साल पहले।
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महानगरपालिका के आला अधिकारी आज कहते फिर रहे हैं कि जिन लोगों ने नाजायज घर खरीदे थे उस समय, उनको मालूम था कि सस्ते मिल रहे हैं इसलिए कि निर्माण नाजायज था। लेकिन बिना उनकी इजाजत के ये फ्लैट बने कैसे? क्या महानगरपालिका के तमाम अधिकारियों को दिखे नहीं वे नाजायज फ्लैट, जब बन रहे थे? यह सवाल जब अधिकारियों से पत्रकारों ने पूछा पिछले सप्ताह, तो जवाब मिला कि हमारा कोई दोष नहीं था, क्योंकि हम 'शो कॉज नोटिस' भेजते रहे। इस भारत महान के अधिकारी भी महान होते हैं दोस्तो, बहुत महान और बहुत बेरहम।

जरा-सी दया होती इनके दिलों में, तो न भेजते बुलडोजर। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद भी ऐसा हल ढूंढने की कोशिश करते, जिनसे लोगों के घर न उजड़ते। मुझे तो रोना आया जब टीवी पर उन बच्चों की बातें सुनीं, जिन्होंने कहा कि उनके इम्तिहान चल रहे हैं इन दिनों, पर घबराहट के माहौल में वे पढ़ नहीं पा रहे। कैसा देश है यह, जहां बच्चों की आंखों के सामने उनके घरों को तोड़ा जाता है? मैंने जब यह बात ट्वीटर पर कही, तो कई गरीबनवाजों ने मुझे अपना गुस्सा दिखाने वाली ट्वीटें भेजीं, जिनमें उन्होंने याद दिलाया कि गरीबों के घर जब ऐसे तोड़े जाते हैं, तो मध्यवर्ग के लोगों के क्यों न तोड़े जाएं।

अव्वल तो यह सच नहीं है। गरीबों की बस्तियां नहीं टूटी हैं मुंबई शहर में, क्योंकि राजनेताओं को हमेशा चिंता रहती है गरीबों के वोटों की। ऊपर से उनकी हिमायत करने पहुंचते हैं अक्सर मेधा पाटकर जैसे लोग। मेधा जी के पिछले एहसान ने उस बस्ती को बचाया, जो एयरपोर्ट की जमीन पर बनी है, सो मुंबई एयरपोर्ट का आधुनिकीकरण रुक गया। अगर टूट भी जाते हैं गरीबों के घर, तो सिर्फ तब, जब उनको कोई दूसरा, बेहतर घर दिया जाता है।

कैंपा कोला के वासी क्योंकि मध्यवर्गीय हैं, उनकी इस लंबी लड़ाई में मदद करने बहुत कम लोग सामने आए हैं। हम जैसे पत्रकार भी तभी पहुंचे, जब बुलडोजर चलने की नौबत आ चुकी थी। टूटने से फिलहाल तो बच गए हैं उनके घर, लेकिन सिर्फ मोहलत मिली है। दुआ कीजिए कि इस मोहलत का फायदा उठाकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और मुंबई महानगरपालिका के अधिकारियों को ऐसा हल मिले, जिससे दोबारा यह दृश्य न देखने पड़ें, जो हमने पिछले सप्ताह देखे थे। सभ्य देशों में लाठियां कभी उन पर नहीं चलतीं, जो अपना घर बचाने के लिए बुलडोजरों के सामने खड़े होते हैं।
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