भारतीय जेलें अत्याचार, मारापीटी, पैसे छुड़ा लेने, गरीब लोगों के बगैर माकूल न्यायिक मदद के लंबे समय तक जेल में रहने, रसूखदारों की आरामगाह व निरापद स्थली के तौर पर कुख्यात हैं। दूसरी तरफ देखें, तो हमारी जेलें निर्धारित क्षमता से कई-कई गुना ज्यादा बंदियों से ठुंसी पड़ी हैं। भारत सरकार के कुछ महीनों पहले के आंकड़े बताते हैं कि देश की 1,382 जेलों में 5,73,200 बंदी हैं, जो कि क्षमता से 131 प्रतिशत अधिक हैं। जेलों में बंद लगभग 78 फीसदी बंदी विचाराधीन हैं।
देश में सर्वाधिक करीब सवा लाख बंदी उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद हैं, जबकि क्षमता है 67,700 की। इसके बाद उत्तराखंड आता है, जहां ऑक्यूपेंसी रेट 182.4 फीसदी है। उसके बाद पश्चिम बंगाल (181 फीसदी), मेघालय (167.2 फीसदी), मध्य प्रदेश (163 फीसदी) और जम्मू-कश्मीर (159 फीसदी) का स्थान है।
गुजरात राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (जीएसएलएसए) ने 24 अक्तूबर, 2024 को जेल सुधारों पर अपनी रिपोर्ट जारी की, जो देश में अपनी तरह की पहली पहल है। इसमें उजागर हुआ कि गुजरात की जेलों में क्षमता से 119 प्रतिशत अधिक बंदी हैं। मजेदार बात यह है कि राज्य की खुली जेलें खाली पड़ी हैं। मध्य प्रदेश के मंदसौर में अफीम की खेती होती है और वहां इससे जुड़े बंदी भीड़ बढ़ाते हैं। मंदसौर जिला जेल में बंदियों की क्षमता से ज्यादा बंधक बंद हैं। यहां एक बार में लगभग 370 बंदियों को रखा जा सकता है, जबकि 640 बंदी हैं। इनमें से 395 बंदी एनडीपीएस एक्ट के तहत बंद हैं।
जेलों में बंद बंदियों में 22 फीसदी दलित, 11 फीसदी आदिवासी और 20 फीसदी मुसलमान हैं। अपराध व जेल के आंकड़ों के विश्लेषण के मायने यह कतई नहीं हैं कि अपराध या अपराधियों को जाति या समाज में बांटा जाए। वहीं, न्याय प्रक्रिया में देरी की वजह से भी जेलों पर भार बढ़ रहा है। दिल्ली दंगों का केस बानगी है, जिसमें ज्यादातर लोगों की अन्य मामलों में जमानत हुई, क्योंकि तथ्य कमजोर थे, लेकिन पुलिस ने अधिक से अधिक समय तक जेल में रखने को यूएपीए लगा दिया। हाईकोर्ट में भी जज बदलते रहे और तीन वर्षों से तारीखें ही बढ़ रही हैं। आए दिन सुनने को आता है कि अमुक व्यक्ति आतंकवाद के आरोप में दस या उससे अधिक वर्षों तक जेल में रहा और उसे अदालत ने बरी कर दिया। इन फैसलों पर इस दिशा से कोई विचार करने वाला नहीं होता कि बीते 10 वर्षों में उस बंदी ने जो बदनामी, तंगहाली, मुफलिसी व शोषण सह लिया है, उसकी भरपाई किसी अदालत के फैसले से नहीं हो सकती।
इसी साल केंद्र सरकार द्वारा न्यायिक सुधार के लिए लाई गई भारतीय न्याय संहिता में बहुत से मामलों में थाने से जमानत का प्रावधान है। इनमें किसी मामले की जांच और न्याय की भी समय-सीमा तय है। चूंकि, अभी न तो पुलिस वाले और न ही बहुत हद तक जिला स्तर के न्यायाधीश इससे पूरी तरह परिचित हुए हैं। लिहाजा जेल भेज कर उत्पीड़ित करने का तंत्र यथावत जारी है। वैसे भी पहले से लंबित कई करोड़ मामलों पर यह नए प्रावधान लागू नहीं होते।
जेल में विचाराधीन बंदियों की बढ़ती भीड़ एक गंभीर मामला है। जेल में विचाराधीन बंदी से कोई काम नहीं करवाया जाता, सो सारा दिन लाखों लोग खाली रहकर समय बिताते हैं और इनमें से ही कई के दिमाग में और अपराध करने के फितूर उपजते हैं। हालांकि लोग अपराध न करें या उन्हें कोई गलत न फंसा सके इसका निदान पहले शिक्षा या जागरूकता और उसके बाद आर्थिक स्वावलंबता ही है। इसके लिए कुछ प्रयास सरकार के स्तर पर और अधिक प्रयास समाज के स्तर पर हों। यह भी जरूरी है कि आम लोगों को पुलिस कार्यप्रणाली, आम लोगों के कर्तव्य और अधिकार, अदालतों की प्रक्रिया, वकील के अधिकार, मुफ्त कानूनी सहायता जैसे विषयों की जानकारी दी जाए। इसके लिए स्कूली पाठ्यक्रम में प्रावधान के साथ कमजोर आर्थिक-सामाजिक स्थिति के मुहल्लों और गांवों में नियमित कार्यशालाएं भी हों। साथ ही छोटे-मोटे अपराधों को जेल के बाहर ही निपटाने की प्रक्रिया पर जोर देना चाहिए।