बिहार रोजगार रिपोर्ट टीम के संचालक के तौर पर अपने अध्ययन में मैंने पाया कि संगठित अपराध का संचालन बिहार से उद्योगों के पलायन का एक कारण है। ऐसे में, वहां पर्याप्त पुलिसकर्मियों का होना जरूरी है। वर्ष 2022 तक स्थायी और संविदा कर्मचारियों सहित बिहार में राज्य सरकार का कुल रोजगार 4.5 लाख के करीब था। इनमें से लगभग 85 फीसदी तीन क्षेत्रों से हैं-स्कूल और उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पुलिस।
बिहार की सरकारी स्कूल प्रणाली अन्य राज्यों की तरह राज्य सरकार की सबसे बड़ी नियोक्ता है। वित्त वर्ष 2012 तक बिहार के सरकारी स्कूलों में चार लाख शिक्षक थे, जिनमें से करीब 3.5 लाख शिक्षक अनुबंध पर थे। इसने 55.28 का छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) दिया, जो उत्तर प्रदेश (33), महाराष्ट्र (30.40), पश्चिम बंगाल (34.88), कर्नाटक (28.69) और तमिलनाडु (24.52) जैसे राज्यों से काफी अधिक है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) द्वारा निर्धारित 30 के पीटीआर बेंचमार्क को पूरा करने के लिए बिहार को वित्त वर्ष 22 में 3.38 लाख से अधिक सरकारी स्कूल शिक्षकों की आवश्यकता थी।
उच्च शिक्षा में, 2022 की शुरुआत तक 13,500 से अधिक शिक्षण और 8,000 से अधिक गैर-शिक्षण पदों के साथ स्वीकृत रिक्तियों की संख्या 22,000 के करीब थी। हाल के वर्षों में यह संख्या बढ़ी है। बिहार की उच्च शिक्षा पीटीआर 60 है, जबकि अखिल भारतीय आंकड़ा 24 था। स्कूली शिक्षा के विपरीत, बिहार सरकार के उच्च शिक्षण संस्थानों में रोजगार पुनर्जीवित नहीं हुआ है।
बिहार की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली कोविड-19 के दौरान ही बेपर्दा हो गई थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रति 1,000 व्यक्तियों पर एक डॉक्टर का मानक तय किया है। लेकिन बिहार में प्रति 22,000 व्यक्ति पर एक सरकारी डॉक्टर है।
वर्ष 2021-22 की ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी रिपोर्ट ने बिहार में स्वीकृत रिक्तियां 58,400 से अधिक और भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानक बेंचमार्क के आधार पर कुल कमी 64,300 से अधिक बताई है। दूसरी ओर, 2021-22 बिहार हेल्थ सोसाइटी की रिपोर्ट के अनुसार, स्वीकृत रिक्तियों की संख्या लगभग 38,000 है। स्वास्थ्य सेवाओं में रिक्तियां भरने की कोई कोशिश भी नहीं दिखती।
बिहार सरकार में तीसरी प्रमुख भर्तीकर्ता बिहार पुलिस है। संयुक्त राष्ट्र प्रति एक लाख की आबादी पर कम से कम 222 पुलिसकर्मी निर्धारित करता है। पर संयुक्त राष्ट्र के मानक पर चलने के लिए एक जनवरी, 2022 तक बिहार पुलिस को अतिरिक्त 1.82 लाख कर्मचारियों की आवश्यकता थी। जबकि बिहार पुलिस की कुल कार्यरत संख्या 1.43 लाख है। वर्ष 2023 के मध्य तक वहां पुलिस बल की 75 हजार स्वीकृत रिक्तियां थीं। दशकों की इस घोर उपेक्षा का परिणाम है कि बिहार में भूमि और संपत्ति से जुड़े अपराधों की संख्या देश में सर्वाधिक है, जबकि हत्या, हत्या के प्रयास, बलात्कार और दलितों के खिलाफ अपराधों में बिहार दूसरे स्थान पर है (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो, 2021)। हालांकि 2022 के अंत में वहां एक बार में करीब 10,500 पुलिसकर्मियों को काम पर रखा गया है और अन्य 22,650 की भर्ती पहले से ही चल रही है।
फिर भी, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर बिहार में उपरोक्त तीन क्षेत्रों में कुल कार्यबल की कमी 2022 तक लगभग छह लाख थी, जबकि स्वीकृत रिक्तियां 3.75 लाख से अधिक थीं। इसने दशकों तक बिहार में सार्वजनिक सेवा वितरण की गुणवत्ता को निचले स्तर पर बनाए रखा है। राज्य को गरीबी और पिछड़ेपन के चक्र से बाहर निकालने के लिए शिक्षकों, स्वास्थ्य कर्मचारियों और पुलिसकर्मियों की पर्याप्त नियुक्ति जरूरी है।