ऐसा ध्यान नहीं पड़ता कि मैंने कभी किसी को उल्लू बनाया हो या बनाने की कोशिश भी की हो, पर हां, खुद उल्लू बना जरूर हूं।
दुनिया में ऐसा कौन-सा बंदा होगा, जो अपने जीवन में एकाध दफा ‘उल्लू’ न बना हो। लेकिन उसने अपने उल्लू बनने का जिक्र कभी किसी से किया नहीं होगा, मगर मुझे यह स्वीकार करने में जरा-भी शर्म नहीं। आखिर शर्म किस बात की? लोग इंजीनियर बनते हैं, डॉक्टर बनते हैं, राइटर बनते हैं, साइंटिस्ट बनते हैं, डायरेक्टर बनते हैं, हीरो बनते हैं, मैं यदि उल्लू बन गया, तो कैसी शर्म?
उल्लू को देखकर अक्सर मैं यही सोचा करता था कि मैं खुद इसके जैसा कब बन पाऊंगा? उल्लू के प्रति मेरे दिल में खास जगह है। उल्लू में सबसे आकर्षक उसकी आंखें होती हैं। जब भी मैं खुद को आईने में निहारता हूं, मुझे अपने चेहरे में उल्लू-सी छाप फील होती है। ऐसा लोगों का भ्रम है कि उल्लू में ‘दिमाग’ नहीं होता। जबकि उल्लू में सामान्य प्राणी के मुकाबले अधिक दिमाग होता है। हां, यह बात अलग है कि वह अपने दिमाग की कारस्तानी कभी जतलाता नहीं, और उल्लू बने रहने में ही संतुष्ट रहता है, ठीक मेरी तरह।
किंतु लोग हैं कि उल्लू शब्द से ही ‘चिढ़ते’ हैं। किसी को आप उल्लू कहकर या बनाकर तो देखिए, तुरंत बुरा मान जाएगा। अपने उल्लू न होने को सरेआम जस्टिफाई करेगा। अभी एक नेता ने दूसरे नेता पर उल्लू बनाने का आरोप क्या लगा दिया, नेताजी सीधा दिल पर ले गए। वह उल्लू नहीं बना रहे हैं, भरी सभा में स्पष्टीकरण भी दे डाला। नेताओं के बीच उल्लू शब्द पर जुबानी-जंग इत्ती तेज हो गई कि शिकायत चुनाव आयोग तक पहुंच गई।
उल्लू होना या बनना ‘बेवकूफी’ का नहीं, बल्कि ‘बुद्धिमानी’ का प्रतीक है। 'गधा होना' चलो एक दफा बुरा लग सकता है, पर उल्लू होना ‘सम्मान’ की बात है। उल्लू के प्रति हमें अपनी धारणा व सोच को बदलना होगा। नो उल्लू बनाइंग की जगह, खूब उल्लू बनाइंग का नारा बुलंद करना होगा। क्या समझे?