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असल मुद्दों की पहचान जरूरी

Tue, 26 Nov 2013 01:17 AM IST
के जी सुरेश
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अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव और अभी हो रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का असर देश की सियासी फिजां पर साफ नजर आ रहा है। मगर
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मुजफ्फरनगर में हुई हिंसा के कुछ दिनों बाद ही भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी की पटना में हुई रैली के दौरान शृंखलाबद्ध बम धमाकों के बाद ऐसी ही बयानबाजी देखने को मिली थी। अब किसी पार्टी विशेष के नेताओं के गलत बयानों को जायज ठहराने और दूसरी पार्टी के नेताओं की सही बातों को भी खारिज करने के लिए वाक्पटुता के साथ तर्क गढ़े जा रहे हैं।

मीडिया रिपोर्टों की मानें, तो नरेंद्र मोदी के धुर विरोधी नीतीश कुमार की अगुवाई वाली बिहार सरकार और केंद्र में यूपीए के अधीन काम करने वाली एनआईए दोनों को ही गुजरात के मुख्यमंत्री के खात्मे की इंडियन मुजाहिदीन की योजना की सूचना मिल चुकी थी और इसी वजह से उनकी सुरक्षा में भी इजाफा किया गया था। इन हालात में उनका यह आशंका जताना कि सीमा पार बैठे कुछ मित्रों ने राजनीतिक या किसी दूसरे ढंग से उनके खात्मे की योजना बनाई, गलत नहीं कहा जा सकता था। लेकिन उनके इस बयान पर जिस तरह तूफान खड़ा किया गया, वह समझ से बाहर है।
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इंदिरा और राजीव गांधी के साथ लगातार चलने वाले वाक् युद्ध के बावजूद तमाम विरोधी पार्टियों ने एक सुर में इन नेताओं की हत्या की निंदा की थी। लेकिन दुर्भाग्य से आज अपने नेता की हर बात को उनके समर्थक जायज ठहराने लगते हैं। यह समझने वाली बात है कि चाहे नरेंद्र मोदी हों या राहुल गांधी, दोनों की जान का समान मूल्य है।

दु:खद यह भी है कि सुशासन, भ्रष्टाचार, महंगाई, विदेश नीति और आंतरिक सुरक्षा जैसे मुद्दे आज चुनावी अभियानों से नदारद दिखते हैं। इनकी जगह संकीर्ण और लच्छेदार भाषणों ने ले ली है। डर का माहौल बनाना, भावुक अपीलें करना और जरा-सी बातों को लेकर राई का पहाड़ बना देना, राजनीतिक बढ़त लेने के नए औजार बन गए हैं।

इन अभियानों को देखकर महसूस होता है कि यह केवल देश की अनपढ़ जनसंख्या को बेवकूफ बनाने की साजिश है, जिससे देश के शिक्षित नागरिकों का कोई सरोकार नहीं है। हाल ही में सरदार वल्लभ भाई पटेल की विरासत को लेकर जो हो-हल्ला मचा, उससे तो यही लगता है। यह सर्वविदित है कि पटेल ने जीवनपर्यंत कांग्रेस को ही अपनी सेवाएं दीं। लेकिन ताजा बहस के बाद मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर आज वह और नेहरू जिंदा होते, तो क्या वे (दोनों) वर्तमान कांग्रेस का हिस्सा बनने को तैयार होते।

वरिष्ठ पत्रकार ए. सूर्य प्रकाश का शोध बताता है कि केंद्र और राज्य सरकारों के तकरीबन 450 कार्यक्रम, परियोजनाएं और केंद्र व राज्य स्तर के संस्थानों के नाम कांग्रेस के तीन दिग्गज नेताओं नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी के नाम पर रखे गए हैं। सवाल उठाया जा सकता है कि इनमें से कुछ योजनाओं या संस्थानों को पटेल समेत उन तमाम नेताओं के नाम से भी पहचान दी जा सकती थी, जो आजादी की लड़ाई के दौरान कांग्रेस का हिस्सा रहे थे।

हमारे देश में विराधियों के भी गुणों के सम्मान की परंपरा रही है। लोग भूले नहीं होंगे, जब 1971 के युद्ध के बाद अटल बिहारी बाजपेयी ने इंदिरा गांधी को 'दुर्गा' कहकर पुकारा था। वैसे भी स्वस्थ राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन इसमें निजी दुश्मनी की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

देश अपने नेताओं से यह अपेक्षा करता है कि वे एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने के बजाय यह बताएं कि पाकिस्तान, चीन, अमेरिका, रूस और दूसरी वैश्विक ताकतों के संदर्भ में उनकी वैदेशिक नीति क्या है? देश के नागरिक जानना चाहते हैं कि नक्सलवाद की समस्या को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष की सोच क्या है? सिर्फ दूसरे की आलोचना करते रहने से कुछ नहीं होगा।

लोग शब्दों के मायाजाल की जगह 'समावेशी विकास' और 'सांप्रदायिकता' जैसे मुद्दों पर नेताओं के विचार जानना चाहते हैं। जैसे सत्ताधारी यूपीए से लोगों को पूछने का हक है कि तमाम नाकामयाबियों के बावजूद उन्हें तीसरा मौका आखिर क्यों दिया जाए, उसी तरह लोग विपक्ष से भी उनकी वैकल्पिक योजनाएं जानना चाहते हैं।

राजधानी दिल्ली समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा है। प्रमुख राजनीतिक दलों का रवैया 'करो या मरो' वाला है। इसके अलावा मीडिया भी जिस तरह राष्ट्रीय मुद्दों को उठा रहा है, उससे यह महसूस होता है कि विधानसभा चुनावों के नतीजों से जनता का रुख साफ हो जाएगा।

हालांकि राजनीतिक दलों को यह ध्यान रखना चाहिए कि मतदाता इतना परिपक्व हो चुका है कि केंद्र और राज्यों के चुनाव में अंतर को समझते हुए समय-समय पर अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव ला सके। कई राज्यों में शानदार प्रदर्शन के बाद अति उत्साहित एनडीए ने 2004 में तय समय से छह महीने पहले ही चुनावी दंगल में उतरने का फैसला किया था। फिर जो हुआ, वह इतिहास है।
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ध्यान रखना चाहिए कि देश में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जोरों पर होने के बावजूद हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक के लोगों ने तत्कालीन राज्य सरकार से नाखुशी जताते हुए विरोधी दल को वोट दिया। हालांकि इसका यह मतलब कदापि नहीं था कि वे केंद्र सरकार की नीतियों से संतुष्ट थे। दरअसल लोग नेताओं के क्षुद्र अहम के टकराव की जगह विचारों और आदर्शों पर आधारित स्वस्थ संघर्ष देखना चाहते हैं।
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