पश्चिम बंगाल का आज हाल यह है कि राज्यपाल एम के नारायणन पूरे राज्य के छात्रों से माफी मांग रहे हैं और ममता बनर्जी कहीं मुंह छिपा रही हैं। जब से वह सत्ता में आई हैं, ऐसा कभी नहीं हुआ था।
पर प्रेसिडेंसी कॉलेज में जैसी तोड़फोड़ हुई, और जिसका आरोप तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर लगा, उसके बाद उनके पास इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं बचा था। एक-एक कर ममता बनर्जी के सभी रास्ते बंद होते जा रहे हैं।
क्या ममता की उल्टी गिनती शुरू हो गई है? ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद से अभी हाल तक स्थिति ऐसी थी कि मार्क्सवादियों के लिए सड़क तो सड़क, किसी गली-कूचे में भी खड़े होने की जगह नहीं बची थी।
देश के किसी भी राज्य में, किसी पार्टी का इतना लंबा राज नहीं चला, जितना मार्क्सवादियों का पश्चिम बंगाल में चला। लेकिन दूसरी सच्चाई यह भी है कि इतने लंबे शासन के बाद, किसी की हैसियत इस तरह हवा में बिला गई हो, ऐसा भी तो नहीं हुआ! ऐसा क्यों हुआ? इसलिए हुआ, क्योंकि तत्कालीन मार्क्सवादी मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य शासन से तब हटे, जब वह अपना सारा सत्व खो चुके थे।
मैं जब भी पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादियों की स्थिति के बारे में सोचता था, मुझे 1977 के बाद की इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी याद आती थी। 1977 की इंदिरा गांधी की चुनावी पराजय, वैसी पराजय नहीं थी, जैसी राजनीतिक दलों की होती रहती है।
श्रीमती गांधी की पराजय वैसी थी, जिसने बता दिया था कि आप वह सब कुछ हार चुकी हैं, जिसके कारण कभी आप थीं, यानी आपका होना अपने- आपको अपमानित करने जैसा है। इसलिए उस समय एक अफवाह यह भी थी कि इंदिरा परिवार इटली जा बसने की सोच रहा है।
लेकिन मोरारजी देसाई-चंद्रशेखर वाली जनता पार्टी की जड़ मूर्खताओं के कारण, इंदिरा गांधी निरर्थकता के इस बिंदु से वापस लौटीं और इस तरह लौटीं मानो भारतीय राजनीति के केंद्र से वह कभी गईं ही नहीं थीं।
ममता बनर्जी ने भी पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादियों को जिस तरह विदा किया था, वह श्रीमती गांधी जैसी ही विदाई थी; और फिर उनकी गलतियां वैसी ही हैं, जैसी जनता पार्टी ने की थीं। इतिहास दोहराता तो है, लेकिन इस तरह?
ममता बनर्जी की गलती यहीं से शुरू हुई कि उन्होंने मान लिया कि वर्षों से जमा हुआ मार्क्सवादी शासन उन्होंने ही उखाड़ फेंका। यह सच था, लेकिन उसी हद तक कि ऐसे ऐतिहासिक परिवर्तनों का कोई-न-कोई निमित्त होता ही है।
लेकिन पहचानना तो पड़ता है कि यह किन कारणों से हुआ और इसके पीछे कौन-कौन सी ताकतें काम कर रही थीं। जब आप यह संतुलन खो देते हैं, तब हर वक्त सींगें ताने लड़ने को उद्धत भैंसे में बदल जाते हैं, जो सबसे लड़ते-लड़ते अपनी छाया से भी लड़ने लगता है।
ममता बनर्जी ने सत्ता में आने के बाद से पश्चिम बंगाल को जो कुछ भी दिया हो, लेकिन वह नहीं दिया, जिसकी उसे जरूरत थी- उसे ममता की जरूरत थी। लंबे दलीय एकाधिकार से पैदा होने वाली नृशंसता, अहमन्यता, क्रूरता और मनमानी से पश्चिम बंगाल क्षत-विक्षत था।
ममता ने उसे यही सब, ज्यों का त्यों लौटा दिया। इस कारण पश्चिम बंगाल के समाज को जो राहत चाहिए थी, वह उसे मिली नहीं और ममता बनर्जी अपनी राष्ट्रीय भूमिका निभाने के लिए दिल्ली में दखल देने लगीं। वह जब रेल मंत्री थीं, तब भी, और जब उनकी पार्टी का कोई रेल मंत्री रहा, तब भी वह यह छाप नहीं छोड़ पाई थीं कि वह एक प्रशासक हैं और दूरंदेशी से देखती-सोचती हैं।
मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वह इसी शैली में काम करती रहीं और हर गलती का ठीकरा दूसरों के सिर फोड़ती रहीं। लेकिन वह ऐसा हर बार, हर जगह नहीं कर सकती हैं, क्योंकि एक हद के बाद दूसरों के सिर फोड़े जाने वाले ठीकरे से अपना सिर भी फूटने लगता है। सुदीप्तो गुप्त के मामले में ऐसा ही हुआ।
इससे पहले भी वह बहुत कुछ ऐसा कर चुकी थीं, जिसे लोकतंत्र में मान्य नहीं कहा जा सकता। काम करने और करवाने की उनकी शैली किसी बिगड़ैल जमींदार की तरह है, जिसमें आदेश चलता है, विचार विमर्श या चर्चा नहीं। सरकार और पार्टी दोनों में ममता ने असहमति की जगह छोड़ी ही नहीं है। वह जो कहें, वही आदेश है, वह जो करें, वही सरकार। दीदी गलत हो ही नहीं सकतीं और इंदिरा इज इंडिया जैसे बदनाम नारे में साम्य खोजना कठिन नहीं।
एक टीवी कार्यक्रम में एक लड़की ने कोई ऐसा सवाल पूछ लिया कि वह बिफर पड़ीं और उसे नक्सली कहती हुईं, कार्यक्रम से बाहर निकल गईं। एक आमसभा में किसी ग्रामीण ने जब पूछा कि खाद के दाम इस तरह क्यों बढ़ रहे हैं, तो ममता ने उसकी गिरफ्तारी का फरमान जारी कर दिया। संभव है कि वह लड़की नक्सली रही हो, और वह किसान विपक्ष का आदमी, तो क्या ममता के राज में किसी को दूसरी राय रखने का अधिकार नहीं है?
आज पश्चिम बंगाल में मीडिया का सामान्य समर्थन ममता ने खो दिया है, नौकरशाही से लेकर उद्योग-व्यापार में कोई उनसे सहानुभूति नहीं रखता; वामपंथ से जुड़े वे सारे बुद्धिजीवी, जो ममता के पास आ गए थे, एड़ियां रगड़ रहे हैं।
वे पीछे नहीं लौट सकते, क्योंकि वहां विचारधारा जैसी कोई बात नहीं बची है, इनके साथ नहीं रह सकते, क्योंकि यहां विचार भी नहीं है। अनुभववृद्ध महाश्वेता देवी ने पश्चिम बंगाल के बौद्धिक जगत का सबसे सटीक वर्णन किया, जब यह कहा कि ममता नहीं, लेकिन विकल्प भी तो नहीं है।
बुद्धिजीवी को विकल्प दिखे या न दिखे, लोग विकल्प खोज ही लेते हैं। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल को इसके लिए विवश कर रही हैं। ममता के लिए वहां ममता किसे है, यह खोज का विषय बनता जा रहा है।