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पाक को सबक सिखाने का वक्त

Sun, 25 Sep 2016 06:26 PM IST
तवलीन सिंह
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तवलीन स‌िंह
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अपने देश में ऐसे लोग कुछ ज्यादा ही हैं जिन्हें ‘अमन की आशा’ सताती रहती है। सीमा पार से संगीतकार, लेखक और कवि यहां आते हैं। यहां से भी हम अमन-शांति के दूत सीमा के उस पार भेजते रहते हैं। पर उधर से जब हर बार हमें थप्पड़ ही मिलते हैं, तब भी हम यह नहीं समझते कि अमन की ताली एक हाथ से नहीं बज सकती। पाकिस्तान ने बार-बार जताया है कि उसे युद्ध से मतलब है, अमन-शांति से नहीं, पर हमारे अधिकतर राजनेता इसे स्वीकार करना नहीं चाहते। इसलिए तब मुझे बहुत अच्छा लगा, जब उड़ी में हुए हमले के बाद हमारे रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत बेशक अमनपरस्त देश है, पर हम हमले का जवाब देना भी जानते हैं। राम माधव की यह बात भी अच्छी लगी कि ‘एक दांत के बदले हम जबड़ा तोड़कर दिखाएंगे।'
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इतने में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र की रक्षा परिषद के वार्षिक सम्मेलन में पहुंचे और अपने भाषण में उन्होंने कहा कि उनकी नजरों में बुरहान वानी कश्मीर के युवा लीडर थे, जिन्हें भारत सरकार ने बेरहमी से मार डाला। यह भी कहा कि भारतीय सेना ने कश्मीर के लोगों पर कहर बरपाया है, जिसे दुनिया के सभ्य देशों को संगठित होकर रोकना होगा।

हमारी समस्या यह है कि अभी तक हमारे जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं, वे सभी अमन की आशा में उलझे रहे हैं। पहली बार ऐसे राजनेता दिख रहे हैं, जिनकी बातों से लगता है कि वे भारत की पुरानी रणनीति बदलने को तैयार हैं। हम विकास की गाड़ी को चाहे जितना भी आगे बढ़ाएं, पाकिस्तान इसे रोकने की पूरी कोशिश करता रहेगा, क्योंकि उसकी रणनीति ही है भारत की बर्बादी। सच यह है कि कश्मीर अब उसके लिए इतना बड़ा मसला नहीं है, जितना कभी था। पाकिस्तान के जरनल अच्छी तरह जानते हैं कि कश्मीर उन्हें कभी मिलेगा नहीं, सो कश्मीर के बहाने वे अपने असली लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं, जो भारत के टुकड़े करना है। इसके लिए पाकिस्तान कुछ भी करने को तैयार है, क्योंकि पाकिस्तान की अहमियत कम होना और भारत का महत्व बढ़ना उसे बर्दाश्त नहीं होता। एक समय नेहरू जी की समाजवादी आर्थिक नीतियों के कारण पाकिस्तान से भारत पिछड़ गया था। मैं जब 1980 में पहली बार लाहौर गई थी, तो यह देख हैरान रह गई थी कि पाकिस्तान के शहरों और सड़कों का हाल भारत से बेहतर था। फिर धीरे-धीरे भारत आगे दौड़ने लगा और पाकिस्तान पीछे रह गया। पाकिस्तान का पुराना दोस्त अमेरिका उसकी जेहादी आदतों से तंग आकर भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने लगा। सो नतीजा यह है कि आज दुनिया में पाकिस्तान का एक ही दोस्त बच गया है, और वह है भारत का पुराना दुश्मन चीन।
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उड़ी हमले के बाद न सिर्फ बांग्लादेश और अफगानिस्तान भारत के पक्ष में बोले, बल्कि कई अन्य इस्लामी देश भी हमारी तरफ बोलते दिखे। अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने पाकिस्तान को खुलेआम फटकार लगाई और उस देश के दो सांसदों ने अमेरिकी कांग्रेस में पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने का प्रस्ताव रखा। अब अगला कदम भारत को उठाना होगा। हमारे राजनेताओं को यह साबित करके दिखाना होगा कि वह पाकिस्तान को दंडित करने की क्षमता रखते हैं और करके भी दिखा सकते हैं। अमन की आशा की बातें हमने बहुत सुनी हैं। अब पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाने समय आ गया है कि वह हमारी भूमि पर छद्मयुद्ध करना ही बंद कर दे।
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