महात्मा गांधी का प्रिय भजन था, वैष्णव जन तो तेने रे कहिए, जे पीर पराई जाणे रे। आध्यात्मिक विवेक और सामाजिक समानता के लिए लड़ने वाले गांधी ने राजनीति को लोकसेवा का माध्यम माना था। समाज के आर्थिक, आध्यात्मिक और व्यवहारिक उत्थान के लिए राजनीतिक आदर्श को उद्देश्य मानना चाहिए। यानी राजनीति से ही लोकनीति साधने का रास्ता निकालना चाहिए, क्योंकि सामाजिकता से अलग कोई राजनीति नहीं हो सकती। आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पिछले दिनों गांधी की राजनीति पर गांधी शांति प्रतिष्ठान में दो दिनों का संवाद हुआ। इसमें दिल्ली में जनसमर्थन से उभरे राजनीतिक विकल्प ‘आप’ का गांधीजनों ने आकलन किया गया और आगे के राजनीतिक संकल्पों को लेकर गहन विचार-विमर्श भी हुआ।
इस वैचारिक मंथन से यह साफ हुआ कि आप ने देशव्यापी मामलों पर गांधी के रास्ते पर अमल किया है। भारतीय राजनीति में गांधी विचार की अगर सबसे ज्यादा जरूरत है, तो वह अभी ही है। इसकी वजह यह है कि देश की राजनीति आज जिस चौराहे पर खड़ी है, वहां से मंजिल पर पहुंचने की गुंजाइश भटकाव भरी है। इस बार लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा युवा मतदान करने वाले हैं। ऐसे में राजनीतिक सत्ता से देश चलाने वालों पर यह दायित्व है कि वे इस युवा पीढ़ी को सामाजिक और आर्थिक समरसता का सही रास्ता दिखाएं और लोकतंत्र को लोकोन्मुख करने की दिशा में सार्थक पहल करें। आज व्यापार में लिप्त राजनीति और विस्मय में पड़े युवाओं को गांधी विचार की खास जरूरत है। राजनीतिक यथास्थिति को तोड़ने और लोकतांत्रिक राजनीतिक माहौल बनाने के लिए गांधी विचार की भूमिका जरूरी है। गांधी जी के लिए राजनीति वह मंच था, जिसके जरिये समाज में लोकसेवा स्थापित की जा सकती है। क्योंकि जो व्यवस्था सत्ता बनाती है, उसको बदलती तो जनता ही है। लोकतंत्र में चुनाव को ही अहिंसक सत्ता परिवर्तन का लोकहित औजार माना गया है।
बदलती राजनीति में चुनकर आए नए नेताओं पर अगर सुचारु सुशासन की जिम्मेदारी रहेगी, तो गांधीवादियों पर युवा मतदाताओं को जागरूक करने का उद्देश्य रहेगा। युवाओं को उनके सार्थक राजनीतिक योगदान के लिए प्रोत्साहित करना होगा। युवाओं को जोड़कर नैतिक-राजनीतिक भागीदारी के लिए गांधीजनों को गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों का संयोजन करना होगा। अपने रचनात्मक कार्यक्रमों से ही गांधी जी युवाओं को जोड़ पाए थे। गांधीजन ही युवाओं को गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों द्वारा राजनीतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व समझा सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि 1977 के चुनाव में जयप्रकाश ने जब संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया था, तब गांधी शांति प्रतिष्ठान ही राजनीतिक यथास्थिति तोड़ने का गढ़ बना था। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी राजनीतिक यथास्थिति तोड़ने के लिए जनता जागरूक हो चुकी है। ऐसे समय देश की जनता भी गांधीवादियों को एकजुट हो एकात्मकता में बंधे देखने की आशा करती है। गांधीजी के आध्यात्मिक, राजनीतिक और सामाजिक योगदान को याद किए जाने का समय भी यही है।
यह तो हम सभी मानेंगे कि आप के राजनीतिक विकल्प के ही कारण दिल्ली विधानसभा चुनाव में धनबल और बाहुबल का असर कम रहा। देश की लोकतांत्रिक राजनीति में आप द्वारा किया गया यह बदलाव अहम और जरूरी है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के जरिये जनता ने सभी राजनीतिक दलों को सकारात्मक अनुभव दिया। कई चीजें साफ भी हुईं। जैसे कि संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि सत्ता में रहते हुए आप आंदोलन या धरना नहीं कर सकते। अरविंद केजरीवाल ने यह बहुत स्पष्ट तरीके से दिखा दिया। बल्कि अहिंसक आंदोलन और व्यवस्थित धरने सत्ता परिर्वतन और सुचारु व्यवस्था के लिए कारगर रहते हैं। गांधी जनों का राजनीतिक समर्थन तत्वनीति और वस्तुस्थिति पर निर्भर रहेगा। ऐसे सार्थक विपक्ष ही राष्ट्रीय राजनीति को रास्ते पर ला सकते हैं। रचनात्मक विरोध में अहिंसक आंदोलन चलते रहने चाहिए। तभी राजनीतिक बदलाव संभव और सार्थक हो सकेगा।