रचनात्मक क्षेत्रों में एआई की बढ़ती उपस्थिति उन मानव लेखकों के अधिकारों के लिए एक संभावित खतरा पैदा करती है, जिनकी रचनाओं के दब जाने या बिना मान्यता के उनकी नकल किए जाने का खतरा है। यह विकास मानव-जनित और एआई-जनित कार्यों के बीच के अंतर को और कम करता है, नतीजतन कानूनी ढांचे की जटिलता बढ़ती है और फिर ऐसे प्रश्न उठते हैं, जैसे कि क्या पारंपरिक कॉपीराइट कानून एआई संचालित युग में भी ‘लेखकों’ के अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं?
जैसे-जैसे यह डिजिटल परिवर्तन विकसित होता जा रहा है, यह पारंपरिक कॉपीराइट कानून के मूल सिद्धांतों को चुनौती दे रहा है। अब जब एआई मौलिक रचनाएं तैयार करने में सक्षम है, तो ‘लेखकत्व’ की परिभाषा ही एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जो मौजूदा कानूनी मानकों के पुनर्मूल्यांकन की मांग कर रही है।
बर्न कन्वेंशन (1886) और भारत का कॉपीराइट अधिनियम, 1957 केवल मानव रचनाकारों को मान्यता देते हैं, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को कानूनी संरक्षण से बाहर रखते हैं। वैश्विक कानूनी मिसालें इस बात की पुष्टि करती हैं कि एआई द्वारा निर्मित रचनाएं मौजूदा कानूनों के तहत कॉपीराइट का दावा नहीं कर सकतीं। 2023 में एआई पर विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डब्ल्यूआईपीओ) वार्तालाप ने एआई द्वारा निर्मित सामग्री में मौलिकता, स्वामित्व और अधिकारों को लेकर बढ़ती चिंताओं पर प्रकाश डाला। कॉपीराइट अधिनियम की धारा 2(क)(अ) कंप्यूटर-जनित रचनाओं के लेखकत्व को मान्यता देती है, लेकिन केवल तभी, जब कोई प्राकृतिक व्यक्ति उस रचना का निर्माण करता है।
वर्ष 2018 में एडमंड डी बेलामी नाम का एक एआई-जनित चित्र नीलामी में 4,32,500 डॉलर में बिका था। इसे किसी इन्सान ने सीधे तौर पर नहीं बनाया था, इसलिए इसके लेखक का श्रेय और रचना का कॉपीराइट किसके पास है? डेवलपर के पास, उपयोगकर्ता के पास, या यह असुरक्षित है। भारतीय कॉपीराइट अधिनियम की धारा 17 यह कहकर मामले को और जटिल बना देती है कि किसी रचना का ‘प्रथम स्वामी’ आम तौर पर लेखक ही होता है, रोजगार या कमीशन के तहत बनाई गई रचनाओं के लिए अपवादों के साथ। ये प्रावधान एआई-जनित सामग्री से जुड़े परिदृश्यों के लिए स्पष्ट रूप से जिम्मेदार नहीं हैं, जिससे एक कानूनी शून्यता बनी रहती है। स्पष्ट वैधानिक मार्गदर्शन के अभाव में भारतीय न्यायालयों को इस मामले में निश्चित मिसाल कायम करनी है।
नागरिक दायित्व मुख्य रूप से कॉपीराइट अधिनियम की धारा 51 द्वारा शासित होते हैं। इसमें स्पष्ट है कि जो कोई भी कॉपीराइट धारक की अनुमति के बिना कॉपीराइट किए गए कार्य का पुनरुत्पादन, वितरण, प्रदर्शन या अनुकूलन करता है, उसे उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। एआई-जनित सॉफ्टवेयर पर लेखक का अधिकार किसके पास है, यह प्रश्न उन मामलों में दायित्व के बारे में भी चिंताएं लाता है, जहां कॉपीराइट अधिनियम के तहत संरक्षित कार्य का उल्लंघन किया जाता है। एआई के मामले में, दायित्व का निर्धारण जटिल है, जिसमें डेवलपर्स, उपयोगकर्ता और स्वयं एआई संस्थाओं सहित कई हितधारक शामिल होते हैं। हाल की कानूनी कार्रवाइयों ने इस जटिलता को उजागर किया है। उदाहरण के लिए, ब्लूम्सबरी आदि प्रमुख प्रकाशकों का प्रतिनिधित्व करने वाले फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स ने नई दिल्ली में ओपनएआई के खिलाफ कॉपीराइट का मुकदमा दायर किया है, जिसमें एआई प्रशिक्षण के लिए उनकी सामग्री के अनधिकृत उपयोग का आरोप लगाया गया है।
भारतीय न्यायालयों ने विभिन्न संदर्भों में उचित उपयोग को संबोधित किया है, पर एआई प्रशिक्षण प्रक्रियाओं में अधिक कानूनी स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। सिविक चंद्रन बनाम सी. अम्मिनी अम्मा (1996) के मामले में केरल हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित चार-कारक परीक्षण यह निर्धारित करते समय उपयोगी हो सकते हैं कि किसी उपयोग को उचित माना जाता है या नहीं। उचित उपयोग के मामलों में कोर्ट चार कारकों पर समान रूप से विचार करते हैं: उपयोग का उद्देश्य (व्यावसायिक या परिवर्तनकारी), कॉपीराइट किए गए कार्य की प्रकृति, उपयोग मात्रा व कार्य के बाजार मूल्य पर प्रभाव। हालांकि, यदि एआई आउटपुट वाणिज्यिक, गैर-परिवर्तनकारी हैं, या मूल कार्य के बाजार को नुकसान पहुंचाते हैं, तो वे योग्य नहीं हो सकते हैं। न्यायालयों को इन कारकों का आकलन करना होगा, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि ओपनएआई जैसे एआई डेवलपर्स के खिलाफ कॉपीराइट उल्लंघन के दावे वैध हैं या नहीं। हाल ही में, एएनआई ने ओपनएआई पर एआई प्रशिक्षण में एएनआई के कॉपीराइट वाले समाचार फुटेज के अनधिकृत उपयोग का आरोप लगाते हुए मुकदमा दायर किया। भारत के कॉपीराइट कानून में वर्तमान में एआई-विशिष्ट प्रावधानों का अभाव है और एएनआई बनाम ओपनएआई जैसे मामलों का परिणाम निर्णायक होगा।
एआई और कॉपीराइट कानून एक कठिन बहस में उलझे हुए हैं कि क्या एआई-जनित सामग्री को मानव-निर्मित कार्यों की तरह संरक्षित किया जा सकता है। एआई से संबंधित कॉपीराइट विवादों में विशेषज्ञता रखने वाली अदालतें विवादों को तेजी से सुलझाने में मदद कर सकती हैं। जैसे-जैसे एआई विकसित हो रहा है, कॉपीराइट कानूनों को एआई-संचालित नवाचार के साथ मानवीय रचनात्मकता को संतुलित करने के लिए अनुकूल होना चाहिए। पहले यह माना जाता था कि कॉपीराइट के लिए मौलिकता की आवश्यकता होती है और एआई सोचता या बनाता नहीं है, यह केवल मौजूदा डाटा से पैटर्न को रीमिक्स करता है। लेकिन, चैटजीपीटी और जेमिनी के उदय से यह स्पष्ट है कि नया एआई एक कंप्यूटर प्रोग्राम से कहीं अधिक है और इसे नियंत्रित करने के लिए एक जटिल और कड़े कानून की आवश्यकता है।