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मौसम है केजरियाना

Sun, 15 Feb 2015 07:24 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
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साधो, मौसम केजरियाना हुआ है। दसों दिशाएं सकते में हैं। दिल्ली के भीतर ऐसा तूफान कि सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया। भाजपा के विजयी तीन विधायक भी खामोश हैं। उनकी जुबान को काठ मार गया है। किरण अंधेरा लेकर आई और खुद भी गुमनाम हो गई। मुखी का मुंह बंद है। माकन के हिस्से में भी माखन नहीं आया। नौ महीने से चल रहा मोदी मैजिक सन्नाटे की गिरफ्त में है। तीरथ की तीर्थयात्रा बीच में ही थम गई। ओबामा का बाम भी काम नहीं आया। सुनामी में बड़े-बड़े दरख्त जड़ से उखड़ गए। राजधानी की सड़कों पर केसरिया रथ थम गया। हर्षवर्द्धन सुकून में हैं कि दिल्ली के दंगल में नहीं उतरे। जो कूदे, वे ही कहां पार लग पाए। दिल्ली का भवसागर महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड से गहरा निकला। शाह भी इसकी थाह नहीं लगा पाए। शाह को शहंशाह मानने वाले अब मुंह फेरे खड़े हैं। वे हार की कालिख पर साबुन चुपड़ रहे हैं।
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हमाम में सब नंगे हैं। इस पर बहस जारी है कि कांग्रेसी ज्यादा वस्त्रविहीन हैं या भाजपाई। कल तक जिसके तन पर घुटन्ना दिखाई पड़ रहा था, उस पर सिर्फ कमरबंद नजर आ रहा है। तन ढंकने को कपड़ा नसीब नहीं। आप की कृपा से झाड़ुएं महंगी हो गई हैं। ऐसे में घरों का कूड़ा अब कौन बुहारे? प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान ने दिल्ली से भाजपा का सूपड़ा साफ कर दिया। उनकी झाडू का डंडा आप ने छीन लिया।

सोनिया शून्य में ताक रही हैं। कांग्रेस की जीरो फिगर उन्हें चिंता में डाल रहा है। खबर है कि हारे हुए भाजपाई और कांग्रेसी एक ही चिंतन शिविर में हार की समीक्षा करेंगे। दुख मिलकर ही बंटता है। अजब जुगलबंदी है। माकन और उपाध्याय एक दूसरे की चोटें सहलाने में लगे हैं। दो दुखों का एक सुख इसी को कहा जाता है। आज आप की हवा अंगड़ाई ले रही है, तो दिल्ली उससे नैन-मटक्का करने में लिप्त है। नजीब जंग से अब उसने आंखें फेर ली हैं। कजरारी आंखों का केजरीवाल उसका नया खाविंद है।वह गले के मफलर और खांसी पर फिदा हो गई। वैसे भी दिल्ली हमेशा किसके साथ रही है!
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